भारत हिमाचल प्रदेश "जिला बिलासपुर" (सब कुछ) "India Himachal Pradesh "District Bilaspur" (Everything)

हिमाचल प्रदेश "जिला बिलासपुर "India Himachal Pradesh "District Bilaspur" (Everything) भारत हिमाचल प्रदेश "जिला बिलासपुर" (सब कुछ)

भारत हिमाचल प्रदेश "जिला बिलासपुर" (सब कुछ) "India Himachal Pradesh "District Bilaspur" (Everything) 


हां, बिलासपुर हिमाचल प्रदेश का एक जनपद (जिला) है जिसका मुख्यालय बिलासपुर शहर है। यह जनपद हिमाचल प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित है और इसकी सीमा में पंजाब राज्य होता है।
बिलासपुर जनपद का इतिहास और सांस्कृतिक विरासत बहुत धनी है। यहां के कई प्राचीन मंदिर, किले, और ऐतिहासिक स्थल हैं जो परंपरागत और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
बिलासपुर जनपद का कुछ महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल हैं:
बिलासपुर गढ़: यह गढ़ हिमाचल प्रदेश का सबसे प्रसिद्ध किला है और सतलज़ नदी के किनारे स्थित है।
भाकल गढ़: भाकल गढ़ भी एक प्राचीन किला है जो चम्बा में स्थित है।
गुंगोन गढ़: इस गढ़ का निर्माण राजा उदय सिंह ने किया था और यह भी चम्बा में स्थित है।
कुंजाहाटी घाटी: यह घाटी बिलासपुर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है।
बिलासपुर जनपद का स्थानीय जीवन, सांस्कृतिक विरासत, और प्राकृतिक सौंदर्य इसे एक पर्यटन स्थल बनाते हैं।


 जिले के बारे में
चन्देरी रावंश के राजपूत राजा वीर चन्द ने 697 ई0 में स्थापित कहलूर रियासत के अन्मि राजा राजा आनन्द चन्द थे। कहलू नामक गुर्जर की बकरी एक शिला पर थी जिस पर बाघ तीन बार झपटा परन्तु बकरी द्वारा सींगों से पीछे धकेल दिया गया। कहलू गुर्जर की जुबानी सुने वृतान्त के आधार पर राजा वीरचन्द द्वारा वहां पर एक किले का निर्माण किया गया जिसका नामकरण कहलू गुर्जर के आधार पर कोट कहलूर किया गया तथा रियासत कहलूर नाम से प्रसिद्ध हुई, बिलासपुर कस्बा 1663 में स्थापित हुआ जिस ऋषि व्यास के, व्यास गुफा में उनेक निवास के आधार पर नाम से नामकरण किया गया । बिलासपुर भारत की आजादी के पश्चात एक अलग राज्य के रूप में स्थापित रहा, जिसे कि 1 जुलाई, 1954 को भारतीय संसद के एक एक्ट द्वारा हिमाचल का पांचवां ज़िला बनाया गया । सिख गुरू श्री तेग बहादुर सिंह जी ने बिलासपुर का भ्रमण किया तथा नानकी गांव की स्थापना की। प्रसिद्ध साहित्यकार राहुल सांस्कृत्यायन ने 1957 में बिलासपुर का भ्रमण किया। श्री नैना देवी मन्दिर ,बडोल देवी मन्दिर, पीर भ्याणु मन्दिर, सोहणी देवी का मन्दिर, मारकण्ड मन्दिर, लक्ष्मीनारायण मन्दिर प्रसिद्ध हैं। नलवाड़ी मेला, चैत्र मेला,शाहतलाई गुग्गा मेला नवरात्र मेला नैना देवी प्रसिद्ध मेले हैं। लूहणू मैदान में भव्य खेल मैदान, क्रिकेट स्टेडियम, जल क्रीड़ाएं अदि विभिन्न खेल आयोजनों के स्थल हैं। विक्टोरिया क्रास विजेता श्री भण्डारी राम, परमवीर चक्र विजेता श्री संजय कुमार, फिल्म अभिनेत्री यामी गौतम, गम्भरी देवी, घट नर्तकी फूलां चन्देल, किसान हरिमन शर्मा, केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्री श्री जगतप्रकाश नड्डा ज़िले के प्रमुख व्यक्ति हैं।

इतिहास

स्वतंत्रता पूर्व
          बिलासपुर का पूर्वकालिक शासकीय परिवार अपने आप को चन्द्रवंशी राजपूत के वंशज मानता है, जिन्होंने मध्य प्रदेश के बुन्देलखंड के चंदेरी नामक स्थान पर राज किया। यह स्थान अब गुना जिले का हिस्सा है। कहा जाता है कि चन्देरी साम्राज्य के 7वें शासक हरिहर चन्द्र को माता देवी ज्वालामुखी का स्वप्न आया। इसके बाद उसने अपना भाग्य एक मन्दिर में तलाशना शुरू किया। परिणामस्वरूप उसने अपने साम्राज्य को अपने छोटे पुत्र गोबिन्द को सौप दिया तथा अपने बाकि चार पुत्रों के साथ ज्वालामुखी की ओर प्रस्थान किया। इससे पहले वे ‘जिन्दबाड़ी’ नामक स्थान पर रूके और वहां पर एक किले का निर्माण किया। वे नादौन भी गए जो उस समय कांगड़ा की राजधनी थीं कांगड़ा के राजा ने तम्बू का खूंटा बांधने की एक प्रतियोगिता का आयोजन और विशेष गांठ बांधने वाले व्यक्ति को अपनी पुत्री देने का वादा किया। वास्तव में यह गांठ एक पेड़ की जड़ के समान थी। सबीर चन्द इस प्रतियोगिता में शामिल हुआ परन्तु वह अपने घोड़े से नियंत्रण खो बैठा और मारा गया। इसमें कांगड़ा के राजा की धोखेबाजी पाई गई। इसके बाद युद्ध हुआ और कांगड़ा की सेना हार गई। कांगड़ा -टिक्का’ और चन्देरी राजा हरिचन्द दोनों मारे गए। बचे हुए तीनों चन्देरी राजकुमार ज्वालामुखी मन्दिर लौट आए। अधिरेष्टि देवी प्रकट हुई और उन सबको राज्य देने का वादा किया। भविष्यवाणी सच साबित हुई। तीनों राजकुमारों में से एक को कुमाऊं के राजा ने गोद ले लिया, दूसरे राजकुमार गम्भीर चन्द ने चम्बा पर कब्जा कर लिया तथा सबसे बड़े वीर चन्द को ‘जिन्दबाड़ी’ मिली जो वीरचन्द ही ने पंजाब के रोपड़ में आनन्दपुर तहसील है। वीरचन्द ही ने नयनादेवी मन्दिर बनवाया। अपने लगभग 33 वर्ष के शासन में उसने कहलूर रियासत की सीमा बढ़ाई तथा लगभग 15 पड़ोसी राजकीय राज्यों को अपने अधीन किया। उसके सीमा विस्तार की नीति को सिरमौर के राजा ने रोका जिसके साथ उसने शान्ति संधि की। इसके अंतर्गत उसने अपने लिए कहलूर रियासत रखी। वीरचन्द के बाद बहुत उत्तराधिकारी हुए जिनमें अन्तिम काहण चन्द था जिसने हिंडूर राज्य नालागढ़ को जीता और उसे अपने दूसरे पुत्र सुरजीत चन्द को दे दिया, जिससे कि वर्तमान नालागढ़ का शासकीय परिवार चला है।

शासकीय वंश की राजधानी सन् 1600 तक कोटकहलूर बनी रही। इसके बाद वीरचन्द अपनी माता के साथ सुन्हाणी भाग गया तथा वहीं बस गया। उसके पिता ज्ञान चन्द जो उस समय राजा थे, ने सरहिन्द के पास मुगल शासक के कहने पर इस्लाम कबूल किया। धरमंतर के बाद व कोटकहलूर लौटा और अपने पिता को राजा घोषित किया। उसने सतलुज के दाईं ओर सुन्हाणी में ही राजधानी रखी। 1650 में जब दीपचन्द कहलूर का राजा बना तो उसने राजधनी स्थानांरित की क्योंकि उस जगह को वह नापसंद करता था यह कहा जाता है कि दो हिन्दु और दो मुस्लिमों के साथ उसने राजधनी के लिए नई जगह तलाशी और अंत में सतलुज नदी के बाईं और व्यास गुफा को चुना जो व्यास ऋषी की तपोस्थली थी।

          उसने एक महल ‘धोलर’ नदी के ऊपर बनाया और नदी तट पर एक शहर बसाया जिसका नामकरण व्यासगुफा के नाम से किया। इसे बाद में बिलासपुर के नाम से जाना गया। तब से लेकर बिलासपुर की राजधनी बिलासपुर ही रही यद्यपि वास्तव में जिसे चन्देरी राजवंश ने बसाया था वह गोबिन्द सागर में डूब गया। पुराने शहर के ऊपरी तरफ एक नया शहर बस गया है जोकि समुद्र तल से 673 मीटर ऊँचा है।

स्वतंत्रता उपरान्त

15 अप्रैल, 1948 को 30 पंजाब और शिमला पहाड़ी रियासतों के विलय से हिमाचल प्रदेश भारतीय संघ भाग-ग श्रेणी के राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। ये रियासतें थीं- भागत, भज्जी, बाघल, बेजा, बलसन, धड़ी, घुन्ड, जुब्बल, धामी खनेती, क्योंथल, माध्न, माँधन, मांगल, रतेश, रावड़ीगढ़, सांगरी, सिरमौर, सकेत, थरोच और ठियोग। उस समय तक राज्य के चार जिले चम्बा, मण्डी, महासू, सिरमौर थे तथा कुल क्षेत्रफल 2,716,850 हेक्टेयर था। राज्य को 12 अक्तूबर, 1948 को  संसद के एक्ट के अनुसार केन्द्र के अधीन लिया गया, जो तब तक मुख्य आयुक्त के नियंत्रण में एक अलग इकाई थी, जिसे कि  1 जुलाई, 1 9 54 को हिमाचल प्रदेश के साथ एकीकृत किया गया और 106,848 हेक्टेयर क्षेत्र के साथ एक और जिले को जोड़ा दिया गया ।

शुरू में इसकी दो तहसीलें घुमारवीं और बिलासपुर सदर थीं। जनवरी, 1980 में अलग उप तहसील नयनादेवी बनाई गई जिसका मुख्यालय स्वारघाट था। 1984 में एक और उपतहसील झण्डूता, घुमारवीं तहसील से बनाई गई। इसे पूर्ण तहसील का दर्जा 1998 में दिया गया। प्रशासनिक दृष्टि से जिला दो उपखण्डों,  तीन तहसीलों, 1 उपतहसील, 3 सामुदायिक विकास ब्लॉक, 136 पंचायतों, 2 नगरपालिका तथा 2 अधिसूचित क्षेत्र कमेटी में बंटा हैं 1891 और 1901 की जनगणना में बिलासपुर एक शहर था परन्तु 1911 में इसे अवर्गीकृत घोषित किया गया। 1931 में इसे फिर शहर का दर्जा मिला और तब से यह चल रहा है। नयनादेवी जोकि धार्मिक महत्व का स्थान था को 1953 में नगर का दर्जा मिला। एक लघु कमेटी इसकी देखभाल के लिए गठित की गई। 1961 में से नगरपालिका का दर्जा मिला। 1981 के बाद एक और स्थान शाहतलाई को अधिसूचित क्षेत्र कमेटी बनाया गया।

पैराग्लाइडिंग और हैंगग्लाइडिंग का इतिहास

पैराग्लाइडिंग
हम में से बहुतों ने कभी न कभी उड़ने का सपना देखा ही है। मनोवैज्ञानिक इसे प्रतीकवाद से जोड़ते हैं पर कितने ऐसे मनोवैज्ञानिक हैं जो अपने आरामदायक कमरों और दफ्तरों को छोड़कर घाटियों को निहारते हैं तथा वहां बहती हवाओं को देखते हैं। हमारा मानना है कि नीले मखमली आकाश में उड़ने की तीव्र इच्छा अपने आप में एक ध्येय है और मनुष्य की हमेशा यह अभिलाषा रही है कि वह ऊपर उड़ रहे पक्षियों का पीछा करे।

भूतकाल में यह ज्वलन्त इच्छा उड़ने वाली मशीनों की कमी, धन के अभाव, समय के अभाव द्वारा रोक दी गई। आज हमारे पर नए तरीके, आधुनिक तकनीक कम लागत पर उपलब्ध् है जिससे कि हम प्रत्येक के लिए उड़ना आयान कर सकते हैं। पैराग्लाइडिंग तथा हैंगग्लाइडिंग ने इस सब को संभव कर दिया है तथा लम्बे समय से चले आ रहे सपने को साकार करने का अवसर भी प्रत्येक आम पुरूष एवं महिला को दिया है।

हम अदृश्य द्रव्य ;वायुद्ध में उड़ते हैं जिसे समझना जरूरी है क्योंकि तब ही हम उड़ने की क्षमताओं और सीमाओं को समझ पाऐंगे। एक बार कोई शुरूआती कौशलों को समझ जाए फिर उसमें ऊंचे और आगे उड़ने की तीव्र इच्छा अपने आप उत्पन्न होती है। इस तरह नवप्रशिक्षित पायलट एक नए आयाम में प्रवेश करता है जहां उसका सपना पूरा होता है।

आज हि०प्र० राज्य पैराग्लाइडिंग में देश भर में अगृणी भूमिका निभा रहा है। कोई भी वीलिंग कांगड़ा, सोलंग, मनाली, बंदला, बिलासपुर,  के आसमान में रंग-बिरंगे तितलियों, पैराग्लाइडिंग को उड़ते देख सकते है। इसका श्रेय राज्य सरकार मुख्यतः पर्यटन विभाग को जाता है जिसने की मुख्य भूमिका निभाई है राज्य में पैराग्लाइडिंग को बढ़ावा देने में।

बिलासपुर में पैराग्लाइडिंग

1994 से पहले हि०प्र० में शायद ही कोई पैराग्लाइडिंग या हैंगग्लाइड पायलट, चालक था सिवाय एक, रोशन लाल ठाकुर मनाली से, को छोड़कर जिन्होंने विदेशी पायलटों से उड़ने के कुछ कौशल सीखे थे, जो कि मनाली में आम तौर पर सैलानी के रूप में आते हैं। इस बीच आर०पी० गौतम जोकि केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल से कमाडैंट के रूप में रिटायर हुए थे, ने बंदला शिखर पर पैराग्लाइडिंग की सम्भावनाएं तलाशी। अपने सपने को सच करने के लिए उन्होंने शक्ति सिंह चन्देल, जोकि उस समय पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन विभाग के निदेशक थे, से सम्पर्क साधा, ताकि मदद ली जा सके न केवल बिलासपुर में पैराग्लाइडिंग को बढ़ाने की अपितु सम्पूर्ण हि०प्र० में। पर्यटन निदेशक जो स्वयं बिलासपुर से थे जिन्होंने रूचि ली और बंदला पर्वत को ‘टेक ऑफ’ स्थल घोषित किया। उन्होंने आर्थिक मदद भी प्रदान की बिलासपुर में पैराग्लाइडिंग कोर्स चलाने की। यह कोर्स एयरो एडवैंचर, बिलासपुर के अन्तर्गत श्री बूस मिल्स, न्यजीलैंड तथा अलैक्सी गौरिस्मो रूस के मार्गदर्शन में चला। इस तरह से पैराग्लाइडिंग नक्शे पर बिलासपुर आ गया।
बिलासपुर अन्य उड़ान स्थलों की तुलना में विशेष इसलिए है क्योंकि यह बिलिंग या मनाली की तुलना में आपको अधिक उड़ान समय आठ घण्टे देता है। यहां पर विस्तृत और सुरक्षित उतराव स्थल गोबिन्द सागर झील के तट, लुहणू पर है। प्रशिक्षण के नजरिए से भी बिलासपुर उत्तम है पूरे एशिया में। प्रशिक्षण कला कौशल ग्रंथ में कहा गया है कि पैराग्लाइडिंग के विभिन्न कौशलों के लिए विस्तृत जल स्थल अति आवश्यक है। शायद ही दूसरा कोई और स्थान हो जहां पर उतराव स्थल के साथ इतनी विशाल झील है । बिलासपुर सौभाग्यशाली है कि यहां पर वायु खेल का एक ही जगह पर आद्वितीय मिलन है ।

संस्कृति और विरासत

 
मेले और उत्सव बिलासपुर जिला के लोगों के दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह मेले और त्यौहार यहां के लोगों की सांस्कृतिक धरोहर हैं। इस जिला में प्रतिवर्ष अनेक प्रकार के मेले और त्यौहारों का आयोजन किया जाता है। बिलासपुर जिला में जिन मेले एवं त्यौहारों को मनाया जाता है उनका ब्यौरा/विवरण निम्न प्रकार से है :-

नलवाड़ी मेला
नल्वाडी
नल्वाडी

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर कस्बे में प्रतिवर्ष मार्च और अप्रैल महीने में पशु मेला और नलवाड़ी मेले का आयोजन किया जाता है इस मेले में लोग कुश्ती प्रतियोगिता एवं अन्य मनोरंजक गतिविधियों का आनन्द उठाते हैं। नालागढ़ एवं इसके साथ लगते विभिन्न स्थानों से व्यापारी पशुओं को सजा संवार कर मेले में लाते हैं क्योंकि इस समय उन्हें पशुओं के व्यापार में अच्छा लाभ होने की आशा होती है। बिलासपुर जिले का नलवाड़ी मेला हिमाचल प्रदेश में आयोजित होने वाले अनेक कार्यक्रमों, उत्सवों घटनाओं में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हिमाचल प्रदेश एवं देश के अन्य भागों से लोग इस मेले का आनन्द प्राप्त करने के लिए बिलासपुर कस्बे में आते हैं। पांच दिनों की अवधि् वाले इस मेले में आयोजित होने वाली अनेक प्रकार की मनोरंजक गतिविधियों/कार्यक्रमों में कुश्ती प्रतियोगिता का एक महत्वपूर्ण स्थान है। बिलासपुर में आयोजित होने वाला यह सांस्कृतिक मेला न केवल यहां की कला, संस्कृति और वातावरण को प्रकट करता है बल्कि यह मेला यहां के लोगों की जीवनचर्या को भी प्रदर्शित करता है। अनेक लोग इस  मेले में आते हैं और इस सांस्कृतिक मिलनस्थल पर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

नलवाड़ी पीपुल्स फेस्टिवल पर एक वृत्तचित्र

नवरात्रि मेला/उत्सव श्री नयना देवी जी
शिवरात्रि मेला
शिवरात्रि मेला
श्री नयना देवी जी हिमाचल प्रदेश के अनेक महत्वपूर्ण पूजनीय स्थलों में से एक है। बिलासपुर जिला में स्थित नैना देवी नामक स्थल भारतवर्ष के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस पवित्र स्थल पर वर्ष भर हजारों की संख्या में श्रद्धालु विशेषकर श्रावण, अष्टमी,चैत्र नवरात्रा एवं अश्विन नवरात्रों में इस स्थान पर विशेष श्रद्धालु आते हैं। इन नवरात्रो में हिमाचल प्रदेश के अतिरिक्त देश के अन्य राज्यों जैसे हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उ०प्र० आदि से भी हजारों श्रद्धालु आते हैं जहां सती के अंग धरा पर गिरे हैं।

चैत्र श्रावण और अश्विन नवरात्रों में विशेष मेला आयोजित किया जाता है।

ऐतिहासिक रुचि के स्थल

 
कोट कहलूर का किला
कोट कहलूर
कोट कहलूर
कोट कहलूर किला गंगुआल हाइड्रोईलैक्ट्रिक स्टेशन से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ये श्री नयना देवी जी की पहाड़ी पर स्थित है। बिलासपुर के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों में कोटकहलूर किले का प्रथम स्थान है। कोटकहलूर नाम से प्रसिद्ध यह किला राजा कहल चन्द के पूर्वज राजा बीर चन्द ने बनवाया था। अब नष्ट हो चुका है इस प्रान्त का शासन बिलासपुर में स्थानांतरित होने से पूर्व कहलूर के नाम से जाना जाता था। यहां के स्थानीय लोगों में यह राज्य अभी भी कहलूर के नाम से ही जाना जाता है।

यह किला वर्गाकार आकार का है और इसकी प्रत्येक दीवार 30 मीटर ऊंची एवं 30 मीटर लम्बी है। इन दीवारों की चौड़ाई लगभग 2 मीटर है। यह किला दो मंजिला है और प्रत्येक मंजिल की ऊंचाई लगभग 15 मीटर है। इस किले की दूसरी मंजिल पत्थर के अनेक ऊंचे स्तम्भों पर आधारित है। इस किले की दूसरी मंजिल में श्री नयना देवी माता जी का मन्दिर है जिसमें श्री नैना देवी जी की मूर्ति स्थापित है। यहां पर सात अन्य किले बछरेटू, बहादुरपुर, बसेह, फतेहपुर, सरयूं, स्वारघाट एवं त्यून में स्थित है। सुन्हाणी जो की सीर खड्ड के किनारे बसा एक छोटा-सा गांव है, कुछ समय के लिए इस प्रान्त का मुख्यालय समझा जाता था।

बछरेटू किला
बछरेटू
बछरेटू

बछरेटू एक सुन्दर और शान्त स्थल है जोकि कोट धर की पश्चिमी ढलान और शाहतलाई नामक स्थान से 03 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह किला समुद्रतल से 3000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। बिलासपुर जिले के बछरेटू नामक स्थान पर एक प्राचीन छोटा-सा किला है। यह किला कोट नामक पहाड़ी पर स्थित है। इस स्थल से गोबिन्द सागर झील एवं अन्य पहाड़ियों का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यह किला राजा रत्न चन्द ने बनवाया था जिसने बिलासपुर पर सन् 1355 से 1406 तक शासन किया था। प्राचीन धरोहर के रूप में यह किला लगभग 600 वर्ष पुराना हैं यह किला आयताकार आकार का है। इसकी दो दीवारें लगभग 100 मीटर और दूसरी दो दीवारें लगभग 50 मीटर लम्बी हैं। इन दीवारों की चौड़ाई लगभग एक मीटर है। किले के अन्दर का भाग अनेक कमरानुमा भागों में विभक्त है जिनमें से 15 को अभी भी ढूंढा जा सकता है। इन कमरों की दीवारें लगभग 10 से 12 मीटर ऊंची हैं। यहां पर एक पानी का टैंक, स्नानागार व बाबड़ी है। इस किले में एक छोटा मन्दिर है जिसमें देवी अष्टभुजा की मूर्ति स्थापित है। इसके अतिरिक्त इस मन्दिर में अन्य मूर्तियां भी विद्यमान हैं। किले में एक पीपल का वृ़क्ष भी है।

त्यून किला
तिऊन का किला
ऊन का किला

त्यून किले के अवशेष त्यून पहाड़ी जो सत्रह कि०मी० लम्बी है के शिखर पर विद्यमान है। यह किला बिलासपुर कस्बे से लगभग 45 कि०मी० की दूरी पर स्थित है। घुमारवीं कस्बे से यह किला लगभग 10 कि०मी० की दूरी पर है। राजा काहन चन्द द्वारा इस किले को 1142 विक्रमी में बनवाया गया था। इस किले का क्षेत्रफल लगभग 14 हेक्टेयर है। यह किला आयताकार है। इस किले की लम्बाई 400 मीटर व चौड़ाई 200 मीटर है। इस किले की दीवारों की ऊंचाई 2 से लेकर 10 मीटर के लगभग है। इस किले के मुख्य द्वार की ऊंचाई 3 मीटर व चौड़ाई साढ़े 5 मीटर है। इस किले के अंदर पानी के दो टैंक थे। इसके अतिरिक्त इस किले में दो अन्न भंडार थे जिनमें 3000 कि०ग्रा० अन्न रखा जा सकता था। ऐसा कहा जाता है कि इस किले में राजा खड़क चन्द के चाचा को कारावास की सजा दी गई थी।
औहर का ठाकुर द्वारा

‘औहर’ जिला बिलासपुर के मध्य में स्थित एक कस्बा है। यह बिलासपुर प्रान्त का एक महत्वपूर्ण कस्बा माना जाता था। इस कस्बे के महत्व को ध्यान में रखकर रानी नागरदेई ने इस प्रसिद्ध ठाकुरद्वारे का निर्माण करवाया था। उन्होंने एक पानी की

औहर का किला
औहर का किला
बावड़ी और एक सरायं का निर्माण भी करवाया था जिसमें की यात्री/राहगीर ठहर सकें। ठाकुरद्वारा में ‘शालीग्राम’ और ‘नरसिम्हा’ नाहरसिंह की मूर्तियां स्थापित की गई थीं। इस मन्दिर की दीवारों पर सुन्दर चित्रकारी की गई है। इस मन्दिर की मुरम्मत के लिए संस्कृति एवं भाषा विभाग द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की गई है।

पर्यटन सम्बंधी स्थल

भाखड़ा
भाखड़ा
भाखड़ा बांध
भाखड़ा बांध, सबसे अधिक ऊँचाई तथा सीधे ग्रेविटी वाला दुनिया का सबसे ऊँचा बांध है।  यह  नंगल कस्बे से लगभग 14 कि०मी० की दूरी पर नैना देवी तहसील में स्थित है। यह बांध पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण समझा जाता है। इस बांध को बनवाने का सर्वप्रथम विचार सर लुईस डेन, लेफ्रटीनेंट गोवर्नर पंजाब को आया था और इस सन्दर्भ में उन्होंने सुन्नी से बिलासपुर और बिलासपुर से रोपड़ तक की यात्रा की थी। इस बांध के बनाने की योजना धन सम्बन्धी समस्या के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। सन् 1938-39 में पंजाब प्रांत के रोहतक और हिसार जिलों में भयानक अकाल पड़ा जिसके कारण अनेक लोगों एवं पशुओं को मौत का सामना करना पड़ा। भाखड़ा बांध को बनाने सम्बन्धी योजना को क्रियान्वित करने के लिए पुनः प्रयास किए गए किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के कारण यह योजना क्रियान्वित न की जा सकी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ही इस योजना को मार्च 1948 में क्रियान्वित किया जा सका। 17 नवम्बर, 1955  को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री पं0 जवाहर लाल नेहरू ने भाखड़ा बांध की आधारशीला रखी। यह बांध अक्तूबर, 1962 को बनकर तैयार हो गया।

गोबिंद सागर झील
सतलुज नदी पर भाखड़ा बांध बनने के कारण हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में गोबिन्द सागर नामक झील का निर्माण हुआ है। सिखों के 10वें गुरू श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी के सम्मान पर इस झील का नाम गोबिन्द सागर रखा गया है। अमेरिकी बांध निर्माता हार्बे साल्कम के निरीक्षण में इस बांध का कार्य 1955 में प्रारम्भ हुआ और यह बांध 1962 में बनकर तैयार हुआ। हार्बे साल्कम ने इंजीनियरिंग की कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था, इसके बावजूद भी उनके बांध का प्रारूप/डिजाइन सफल साबित हुआ है। इस बांध में जल स्तर को बनाये रखने के लिए व्यास नदी के पानी को भाखड़ा-ब्यास लिंक के माध्यम से गोविन्द सागर झील में डाला गया है। भाखड़ा-ब्यास लिंक योजना का कार्य 1976 में सम्पन्न हुआ। गोविन्द सागर झील 90 कि०मी० लम्बे एवं 170 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है। इस झील में अनेक प्रकार की जलक्रिड़ाओं व जल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है जैसे वॉटर स्कीयंग, वॉटर सेलिंग, क्याकिंग, वॉटर स्कूटर, रेसिंग इत्यादि। पर्यटन विभाग की ओर से इन खेलों का आयोजन पूर्णतः जल स्तर पर होता है।

न्यू बिलासपुर टाऊन
बिलासपुर टाउन

वर्ष 1963 में जब कहलूर प्रांत की राजधानी/मुख्यालय सुन्हाणी से बिलासपुर स्थानातरित की गई थी, तब यह पुराना बिलासपुर कस्बा अस्तित्व में आया था। वर्तमान समय में यह पुराना बिलासपुर कस्बा गोबिन्द सागर झील में डूब चूका है। नया बिलासपुर कस्बा पुराने बिलासपुर कस्बे से थोड़ा ऊपर ही स्थापित किया गया है। नये बिलासपुर कस्बे की ऊंचाई समुद्रतल से लगभग 670 मीटर है।

नया बिलासपुर कस्बा आधुनिक नगर योजना के मापदण्डों पर स्थापित किया गया है। यह भारतवर्ष का प्रथम सुनियोजित पहाड़ी कस्बा है। नया बिलासपुर कस्बा किरतपुर से लगभग 64 कि०मी० की दूरी पर चण्डीगढ़-मनाली रोड़ पर स्थित है। यह बिलासपुर जिले का मुख्यालय भी है।

प्रत्येक वर्ष मार्च महीने में इस कस्बे में नलवाड़ी मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में कुश्ती प्रतियोगिताओं के साथ-साथ अन्य मनोरंजक गतिविधियाँ का आयोजन भी किया जाता है। पंजाब के अनेक भागों से इस मेले में व्यापारियों द्वारा पशुओं को बेचने के उद्देश्य से लाया जाता है। इस स्थान पर शिमला, हमीरपुर, कांगड़ा, कुल्लु, मण्डी आदि स्थानों से बस के द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। इस जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में श्री नैना देवी जी मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर, गोपाल मन्दिर आदि प्रमुख हैं।
कन्दरौर पुल
अत्याधिक सुन्दर और मंत्रमुग्ध करने वाला कन्दरौर पुल बिलासपुर कस्बे से 8 कि०मी० की दूरी पर एन-एच-88 पर सतलुज नदी पर बनाया गया है। इस पुल के निर्माण का कार्य अप्रैल, 1959 में प्रारम्भ हुआ था और यह पुल 1965 में बनकर तैयार हुआ और इस पुल के निर्माण पर 28,12,998 रुपये खर्चा हुआ। इस पुल की लम्बाई 280 मीटर, चौड़ाई 7 मीटर और ऊंचाई 80 मीटर है। यह पुल विश्व के सबसे ऊंचे पुलों में से एक है। यह पुल बिलासपुर, घुमारवीं और हमीरपुर को एक दूसरे के साथ जोड़ता है। इस पुल का उद्घाटन तत्कालीन यातायात मंत्री श्री लाल बहादुर ने 1965 में किया था।

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