जाड़ों में करती है दवा का काम सिसुंण (बिच्छू) की सब्जी एवं मंडुवे की रोटी

 जाड़ों में करती है दवा का काम सिसुंण (बिच्छू) की सब्जी एवं मंडुवे की रोटी

In winter, the work of medicine is done by the vegetable of sisun (scorpion) and the bread of manduve.

देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के पुराने लोग सिसुंण (बिच्छू) के आयुर्वेदिक फायदे जानते थे तभी तो इसकी सब्जी उनके खान-पान का अहम हिस्सा थी, मंडुवा (क्वादु, रागी एवं कई नामो से जाने वाला यह साधारण अनाज) भी किसी जमाने में गरीबों का खाना माना जाता था, पर धीरे धीरे अपनी पौष्टिक गुणवता के मालूम होते ही सब का चहेता अनाज बन गया है। 

मंडुवा

आज के उपभोक्ता बाजार में गेहूं से महँगा मंडुवा हो गया है, कई क्षेत्रों में लोग इसके बिस्कुट भी बनाने लगे हैं! विदेशों में जो भारत के उत्तराखंडी, कर्नाटकी और विहार, महाराष्ट्र के कुछ भागों के लोग रहते हैं, भारतीय स्टोरों में उनके लिए मंडुवे का आटा और साबुत दाना आसानी से मिल जाता है। कहने का तात्पर्य यह है की मंडुवे की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है, तो इसके उत्पादन को भी प्रोत्साहन मिल रहा है।

सिसुंण (बिच्छू)

इसमें औषधीय गुणों की भरमार होती है, इसके पत्तों में खूब आयरन होता है! जो कि खून की कमी को दूर करता है। इसके अलावा फोरमिक ऐसिड, ऐसटिल कोलाइट और विटामिन ए भी भरपूर मात्रा में मिलता है। इसका सेवन पीलिया, उदर रोग, खाँसी-जुकाम में फायदा देता है। मोटापे से निजात दिलाने में भी ये फायदेमंद है। इसके अलावा किडनी संबंधी बीमारियों में भी सिसुंण (बिच्छू) के सेवन की सलाह दी जाती है। तभी पुराने समय में पहाड़ के लोगो को बीमारियाँ नही जकड़ पाती थी और उन लोगों की लंबी उम्र तक जीने की वजह भी ऐसी ही प्राकृतिक चीजों का सेवन करना होता था।

ऐसी और कई सारी प्राकृतिक चीजें देवभूमि उत्तराखण्ड में प्राचीनकाल से ही औसधी का काम करती आई हैं, जिनकी जानकारी आज के युग में हम में से बहुत कम लोगों को होती है।

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