बाड़वाला एवं देवदुंग की ईष्टका-चितियां

बाड़वाला एवं देवदुंग की ईष्टका-चितियां (Brick Altars)-

 Brick Altars of Barwala and Devdung / badwala evam devadung key ishtaka-chitiyan (Brick Altars)-
यमुना नदी तट पर अवस्थित इन स्थलों से प्राप्त चितियों से ज्ञात होता है कि वैदिक यज्ञ परम्परा इस क्षेत्र में तृतीय सदी तक प्रचलन में रही। यह काल इस क्षेत्र में कुणिन्द सत्ता के वैभव का काल था। इस काल में इस क्षेत्र के काष्ठ निर्मित मन्दिरों की एक विशिष्ट शैली प्रचलित थी जिसे वास्तुशास्त्रियों ने 'यमुना प्रासाद शैली' नाम दिया है। 
लौकिक साहित्य

पाणिनि की कृति अष्टाध्यायी में 5वीं शताब्दी ई०पू० से पूर्व विद्यमान मध्य हिमालयी जनपदों का उल्लेख हुआ है। गुप्तकालीन महाकवि कालीदास की प्रमुख रचनाओं अभिज्ञान शाकुन्तलम् एवं मेघदूत से समकालीन गढदेश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं भौगोलिक स्थिति का विस्तृत वर्णन मिलता है। कार्तिकेयपुर के राजा एवं उनके अभियानों का उल्लेख देवीचन्द्रगुप्तम, हर्षचरित्र एवं काव्यमीमांसा आदि ग्रन्थों से भी प्राप्त होता है। भारतीय संदर्भ में प्रथम ऐतिहासिक मानी जाने वाली कल्हण की रचना राजतंरगिनी में ललितादित्य के अभियानों की कड़ी में 'केदारमण्डल' एवं 'स्त्रीदेश' का उल्लेख प्राप्त होता है। केदारखण्ड में "श्रीक्षेत्र" माहात्मय का विस्तार से वर्णन है जो श्रीनगर के प्राचीन धार्मिक महत्व की ओर इशारा करता है। इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास की जानकारी चीनी यात्रियों के वर्णन में भी मिलता है। फाहयान एवं युवानच्वाड़ के द्वारा गोविषाण (काशीपुर) नगर का विस्तृत वर्णन दिया गया है जिससे इस नगर के हिन्दु एवं बौद्ध धर्मनगरी के रूप में भी पहचान स्थापित हुई है। सिरमौर राज्य के ऐतिहासिक दस्तावेजों से भी इस प्रदेश का इतिहास ज्ञात होता है। सम्भवतः कालसी नगर कई बार सिरमौर की राजधानी भी रहा।
 Brick Altars of Barwala and Devdung / badwala evam devadung key ishtaka-chitiyan (Brick Altars)

प्राचीन उत्तराखण्ड

प्रसिद्ध भूगोलविद् टालमी ने दूसरी शताब्दी ई०पू० व्यास, गंगा और यमुना के ऊपरी क्षेत्र में कुलेंद्र (कुणिन्द) जाति के वास का उल्लेख किया है। सम्भवत् कुणिन्द जाति उत्तराखण्ड पर राज्य करने वाली पहली राजनैतिक शक्ति थी। कालसी से प्राप्त अशोक के शिलालेख से प्रतीत होता है कि आरम्भ में कुणिंद जाति मौर्यों की अधीनस्थ शक्ति थी। इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अमोघभूति था जिसकी चाँदी (रजत) एवं ताँबे की मुद्राएँ व्यास नदी से लेकर अलकनन्दा नदी एवं दक्षिण में सुनेत एवं बहेत तक मिलती है। उसकी मुद्राओं के अग्रभाग पर प्राकृत भाषा में "राजः कुणिनदस अमोधभूतिस महरजस" अंकित है। 
मौर्यकाल में यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य की उत्तरी सीमा था। कालसी शिलालेख (जनपद-देहरादून) से तराई क्षेत्र पर मौर्य साम्राज्य की अधीनता प्रमाणित होती है। तथापि मध्य हिमालय के पर्वतीय भाग पर अभी भी कुणिंद नरेशों का ही शासन रहा होगा। सम्भवतः अशोक के शासन के 17 वें 18वें वर्ष में बौद्ध धर्म की लहर पहली बार मध्य हिमालय में पहुँची।

सेवा-पानी से प्राप्त स्तुप के भाग्नावशेष का सम्पूर्ण अध्ययन अभी बाकी है। फिर भी अनुमानित किया गया है कि यह शुंगकालीन है। यद्यपि शुंगकाल में हिमालय का कुणिन्द राज्य दून एवं तराई क्षेत्र अपने स्वतंत्र आस्तित्व में था।

डॉ० यशवन्त सिंह कटोच के अनुसार मध्य हिमालय की कुणिन्द सत्ता के तीन प्रकार के सिक्के मिलते है जो 200-300 ई०पू० के मध्य की जानकारी का एकमात्र स्त्रोत है।

  1. अमोधभूति के सिक्के- अटूड़ से प्राप्त उत्खनित् सामाग्री में अमोज्ञभूति की रजत मुद्राओं के साथ ही दो स्वर्ण श्लाकाएं भी प्राप्त हुई है।
  2. अल्मोड़ा से प्राप्त 4 मुद्राएँ जो ब्रिटिश संग्रहालय लंदन में रखी गई है। इसके अतिरिक्त कत्यूर घाटी से भी 54 मुद्राएँ प्राप्त हुई है।
  3. कुणिन्द अराध्य छत्रेश्वर अथवा चत्रेश्वर के नाम पर निर्गत मुद्राएँ ।

मौर्य साम्राज्य के विघटन के पश्चात् उत्तर भारत को पुनः एक राजनीतिज्ञ सूत्र में पिरोने का श्रेय कुषाणों को जाता है। महान सम्राट कनिष्क प्रथम ने मध्य हिमालय के तराई क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाया। कुषाणों की मुद्राएँ उत्तराखण्ड के तराई क्षेत्र एवं शिवालिक श्रेणी के समीप तक से प्राप्त हो चुकी है। इससे प्रतीत होता है कि कुणिन्दो का मैदानी क्षेत्र कुषाणों के अधिकार में चला गया। यद्यपि मध्य हिमालय के पर्वतीय भाग पर कुणिन्दों की स्वतन्त्र सत्ता बनी रही। कुषाण साम्राज्य अधिक लम्बे समय तक स्थिर न रह सका और कुणिन्द वंश ने हिमालय के तराई एवं मैदानी क्षेत्र पर अपना अधिकार पुर्नस्थापित कर लिया। 
कुषाणोत्तर काल में मध्य हिमालय पर गणतन्त्र एवं राजतन्त्र दो प्रकार के शासन का उल्लेख अभिलेखों एवं मुद्राओं से प्राप्त होता है। इनमें से युगशैल वंश (वार्षगण्य गोत्र) के प्रतापी राजा शीलवर्मन (250-300 ई0 के मध्य) के यमुना तट (कालसी) पर अवश्वमेघ यज्ञ करने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

कुषाणोत्तर काल में मध्य हिमालय के वंश 

यौधेश वंश       |                                    :  मध्य हिमालय के पश्चिमी भाग में (कांगडा, शिमला, जौनसार-
                                                                भाबर, काला डांडा, सहारनपुर क्षेत्र से मुद्राएँ प्राप्त (गणतन्त्र)
परवर्ती कुणिन्द वंश                                  :मध्य हिमालय के पर्वतीय भाग पर (राजतन्त्र)
                                                      
युगशैलवंश (वार्षगण्य गोत्र)                         :    कालसी प्रदेश पर (राजतन्त्र)

गुप्तकाल (3-5 वीं शताब्दी) के मध्य तक की मध्य हिमालय की राजनैतिक तस्वीर अस्पष्ट ही है। समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति में वर्णित नेपाल के पश्चिम् स्थित कर्तापुर राज्य की साम्यता इतिहासकार गढ़वाल-कुमाऊँ से करते है जिसमें वे रूहेलखण्ड (बरेली) और यमुना नदी का पश्चिमी भू-भाग भी शामिल मानते है। लाखामण्डल खण्डित शिलालेख के अनुसार इसके आस-पास का क्षेत्र गुप्त साम्राज्य का हिस्सा था। गुप्तकाल में कालसी के आसपास के भूभाग पर यादवों की शाखा के शासन का पता चलता है। गुप्त साम्राज्य के पतन के साथ ही मध्य हिमालयी क्षेत्र में पुनः परम्परागत राजवंशो का शासन स्थापित हुआ था जिनमें यादव एव नाग वंश प्रमुख थे। लाखामण्डल प्रशस्ति में यादव वंश की 11 पीढ़ियों के 12 शासकों का नाम उल्लिखित है। इसमें यमुना प्रदेश के यादवों की राजधानी सिहंपुर बताई गई है।

मध्य हिमालय के पर्वतीय भाग पर 6-7वीं ई0 में नाग सत्ता का आस्तित्व था। गोपेश्वर (चमोली) से प्राप्त त्रिशुल लेख में चार नागवंशी राजाओं स्कन्दनाग, विभुनाग, अंशुनाग एवं गणपतिनाग के नाम मिलते है। गणपतिनाग सम्भवतः इस वंश का सबसे शक्तिशाली राजा था।

पांचवी शताब्दी के उत्तरार्ध में नाग वंश ने कृर्तपुर के कुणिन्दों की सत्ता समाप्त कर उत्तराखण्ड पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। छठी शताब्दी में कन्नौज के मौखारियों ने नाग सत्ता का अंत कर इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। हर्षवर्धन का एक पर्वतीय राजकुमारी से विवाह का उल्लेख मिलता है। बाणभट्टकृत् हर्षचरित में इस काल में उत्तराखण्ड की यात्रा पर आने वाले लोगों का वर्णन है। हर्ष के शासनकाल में भारत यात्रा पर आये चीनी यात्री हवेनसांग गंगाद्वार (हरिद्वार) तक आया था। वह लिखता है कि "भागीरथी तट पर हरिद्वार नगर है जो लगभग 20 ली के घेरे में है। वह ब्रह्मपुर राज्य का वर्णन करता है जिसके लिए उसने 'पो-लि-हि-मो-पु-लो' शब्द का प्रयोग किया है।

हर्षोत्तर काल में पुनः यह क्षेत्र राजनैतिक विघटन का शिकार हुआ एवं कई छोटी-छोटी शक्तियों ने अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित किये। सैन्य दृष्टि से ये सभी बहुत ही दुर्बल राज्य थे। अतः सुरक्षा की दृष्टि से इन दुर्बल राजाओं ने छोटी-छोटी गाढ़ियों (कोटों) का निर्माण कर लिया था। डॉ० कटोच के अनुसार इनमें तीन ब्रह्मपुर, शत्रुध्न और गोविषाण (काशीपुर) प्रसिद्ध थे। ये तीनो राज्य कुणिन्द राज्य से पृथक होकर कुछ समय तक कान्यकुब्ज (कन्नौज) साम्राज्य का हिस्सा भी रहे। चीनी यात्री युवानचुवाड़ के यात्रावृतांत में इन तीनों राज्यों का उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार शत्रुध्न राज्य की पूर्वी सीमा पर गंगा और उत्तर में ऊचे पर्वत अवस्थित थे जबकि यमुना इस राज्य के मध्य से होकर बहती थी। वह बताता कि इन तीनों राज्यों में सर्वाधिक विस्तार ब्रह्मपुर राज्य का था जो गंगा नदी के पूर्व से लेकर करनाली नदी तक था। इसकी उतरी सीमा पर महाहिमालय में सुवर्णगोत्र देश था जिसमें वर्तमान काशीपुर के अतिरिक्त रामपुर एवं पीलीभीत शामिल थे। गोविषाण की पहचान कर्मिंघम ने वर्तमान काशीपुर से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर उज्जैन गाँव के दुर्ग से की है। 

डॉ. कटोच के अनुसार उपरोक्त तीनों राज्यों के अतिरिक्त देवप्रयाग के आस-पास गंगा के तटवर्ती क्षेत्र में एक स्वतंत्र राज्य का आस्तित्व भी था। जबकि गढ़वाल के दक्षिण में पाण्डुवाला और मोरध्वज के दो लघु राज्य भी थे।

कत्यूरीयुग (7वीं शताब्दी ई0-15वीं शताब्दी ई० तक)-

हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् मध्य हिमालय में राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई। इस काल में ब्रह्मपुर, शत्रुघ्न एवं गोविषाणराज्य आस्तित्व में आए। लगभग 675 ई0 के आस -पास इनमें से सबसे बड़े ब्रह्मपुर राज्य का पतन हो चुका था। तत्पश्चात् 700 ई0 के आस-पास कत्यूरीघाटी में कार्तिकेयपुर (बैजनाथ के पास) जनपद अल्मोड़ा स्थान को केन्द्र बनाकर वसंतदेव ने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। इस राज्य के अन्तर्गत गढ़वाल, कुमाऊँ एवं रूहेलखण्ड का विस्तृत भूभाग आता था। कत्यूरी घाटी से उदित्त होने के कारण इतिहास में इसे "कत्यूरी राज्य" के नाम से जाना जाता है।

कत्यूरीयुग के राजवंशो ने सम्भवतः मध्य हिमालय को प्रथम बार राजनैतिक एकता के सूत्र में बाँधा और लगभग 300 वर्षों के शासनकाल में कत्यूरी शासकों ने वास्तुकला की अनमोल धरोहर हमारे लिए छोड़ी हैं। इस वंश के अब तक नौ अभिलेख प्राप्त हो चुके है। इस काल में 7 कत्यूरीराजवंशो ने इस भूभाग पर शासन किया। यह मध्य हिमालय का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश है।

1. बसंतदेव का राजवंश- बागेश्वर से प्राप्त त्रिभुवनराज के शिलालेख से ज्ञात होता है। कि प्रथम कत्यूरी नरेश का नाम बसन्तदेव था। इसने सातवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में अपनी राजधानी कार्तिकेयपुर को बनाया। बागेश्वर लेख से बसन्तदेव की उपाधि 'परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर' मिलती है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बसंतदेव ने अपनी स्वतंत्र सत्ता की स्थापना कर ली थी। बसंतदेव ने बागेश्वर के निकट एक देवमन्दिर को स्वर्णेश्वर नामक ग्राम दान में दिया था। इसी लेख में उसके पुत्र की चर्चा भी है लेकिन जीर्णशीर्ण होने कारण उसका नाम स्पष्ट नहीं हो पाता है। 
2. खर्परदेव का वंश- बागेश्वर लेख से ही हमें बसंतदेव के वंश के पश्चात् खर्परदेव के राजवंश का वर्णन मिलता है। खर्परदेव कन्नौज नरेश यशोवर्मन का समकालीन था। यशोवर्मन ने हिमालय का कुछ हिस्सा विजित किया था। जबकि कल्हण की राजतरंगिणी से कश्मीर के शासक ललितादित्तय मुक्तापीड़ द्वारा गढ़वाल तक साम्राज्य विस्तार का उल्लेख है। सम्भवतः इन आकमणों के दौरान ही खर्परदेव ने कार्तिकेयपुर पर अधिकार किया होगा। खर्परदेव की वंशावली इस प्रकार मिलती है-

खर्परदेव -> कल्याणराज त्रिभुवन राज

त्रिभुवनराज राजा कल्याणराज और रानी लद्धादेवी का पुत्र था। त्रिभुवनराज की उपाधि 'परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर त्रिभुवनराज' मिलती है। उसने किसी किरात-पुत्र से सन्धि की थी। इसके अतिरिक्त उसके द्वारा व्याद्येश्वर देवता के मन्दिर को भूमिदान का उल्लेख भी प्राप्त होता है।

3 राजनिबंर का राजवंश- बागेश्वर लेख से कत्यूरीघाटी के तीसरे राजवंश का नाम राजनिंबर का वंश मिलता है। नालंदा से प्राप्त अभिलेख से हमें गोंड (बंगाल) नरेश धर्मपाल द्वारा गढ़वाल क्षेत्र तक अभियान का उल्लेख मिलता है। सम्भवतः इस अभियान के पश्चात् उत्पन्न अव्यवस्था का लाभ उठाकर राजनिम्बर ने खर्परदेव वंश को समाप्त कर अपना राज्य स्थापित किया। राजनिम्बर राजवंश की वंशावली इस प्रकार है -

राजनिम्बर -> इष्टगण -> ललितसूर -> भूदेव

राजनिबंर एक शक्तिशाली शासक था। उसके पश्चात् उसका पुत्र इष्टगण गद्दी पर बैठा जिसने पुनः परमभट्टारक महाराजधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की थी। पाण्डुकेश्वर से प्राप्त दो ताम्रपत्र अभिलेखों में इष्टगण तथा रानी वेगदेवी के पुत्र ललितशूर का उल्लेख मिलता है। सम्भवतः ललितशूर का पुत्र भूदेव इस वंश का अन्तिम शासक था।

4. सलोणादित्तय का राजवंश- तालेश्वर एवं पाण्डुकेश्वर के ताम्रपत्र लेखों से राजनिबंर वंश के पश्चात् सलोणादित्तय वंश के शासन का वर्णन मिलता है। इस नये वंश की स्थापना  सलोणादित्तय के पुत्र इच्छटदेव द्वारा हुई। उसकी उपाधि 'भुवन-विख्यात-दुर्भदाराति-सीमन्दिनी-वैधत्यदीक्षादान-दक्षैकगुरुः मिलती है। जिसका अर्थ होता है कि वह स्वयं को विश्वविख्यात शत्रुओं की पत्नियों को वैधव्य की दीक्षा देने वाला सफल गुरु समझता था। सम्भवतः उसने कई युद्धों में सफलता प्राप्त की होगी।

5. पालवंश- बैजनाथ क्षेत्र से प्राप्त अभिलेखो में "पाल" नाम के राजाओं का उल्लेख हुआ है। इनमें प्रमुख थे लखनपाल, त्रिभुवनपाल, रूद्रपाल एवं उदयपाल आदि। इन राजाओं ने ग्यारवीं एवं बाहरवीं शताब्दीं में कत्यूर घाटी से मध्यहिमालय पर राज्य किया।

6. काचलदेव का वंश- गोपेश्वर अभिलेख (1223 ई0 जनपद-चमोली) से क्राचल्लदेव के शासनकाल का वर्णन मिलता है। वह ढुलू का शासक था। उसने 1223 ई0 में कत्यूरी शासकों को पराजित कर इस क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया था। गोपेश्वर से ही प्राप्त त्रिशुल लेख (1268 ई०) से इसी वंश के अशोकचल्ल की विजयों का वर्णन मिलता है जिसने 13वीं शताब्दी में नेपाल में मल्ल राजवंश की स्थापना की। यद्यपि गढ़वाल की लोकगाथाओं में मल्ल राजवंश का उल्लेख कत्यूरी राज्य के नाम से ही प्राप्त होता है। मल्ल राजवंश के ढुलू से प्राप्त अभिलेख से ज्ञात होता है कि कुमाऊँ, गढ़वाल तथा पश्चिमी तिब्बत तक राजवंश के शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।

7. आसंतिदेव का वंश- मूलतः आसंतिदेव जोशीमठ का शासक था। कुछ समय पश्चात् उसने कत्यूर राज्य पर अधिकार कर लिया था। जोशीमठ से प्राप्त हस्तलिखित ग्रन्थ "गुरुपादुक" में आसंतिदेव के वंशजो के नाम मिलते है। इसके अनुसार इस वंश का वंशवृक्ष इस प्रकार है। 

आसंतिदेव के पूर्वज अग्निबराई ->फीणबराई -> सुबतीबराई ->आसंतिदेव

आंसतिदेव के बाद के शासक

बासंतीराई ->गोराराई -> सांवलाराई
आंसतिदेव का वंशवृक्ष-
आंसतिदेव की राजधानी जोशीमठ थी। उसने नाथपंती संत नारसिंह के कहने पर अपनी राजधानी कत्यूर घाटी के रणचूलाकोट में स्थापित की। इस वंश का अंतिम शासक ब्रह्मदेव था जो अत्यंत अत्याचारी शासक था। जियारानी की लोकगाथा के अनुसार तैमूरलंग ने इसके शासन काल में (1398 ई०) हरिद्वार पर आक्रमण किया था। 15वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में ब्रह्मदेव के साथ ही आंसतिदेव वंश का अंत हुआ।
 उत्तराखंड का इतिहास
History of Uttarakhand /Uttarakhand ka Itishas 
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(1) महान हिमालयी क्षेत्र
(2) मध्य हिमालयी क्षेत्र,
(3) शिवालिक हिमालयी क्षेत्र
(4) गंगा का मैदानी क्षेत्र

Up coming work तालिका-2

ऐतिहासिक काल में उत्तराखण्ड
श्रीनगर के ध्वंसावशेष
गोविषाण के ध्वंसावशेष
कालसी ध्वंसावशेष
अन्य नगरों से प्राप्त ध्वंसावशेष
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उत्तराखंड का आध्र- ऐतिहासिक काल उत्तराखंड
(1) पुरातात्विक स्त्रोत
(2) लिखित स्त्रोत
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उत्तराखण्ड के ऐतिहासिक स्त्रोत
(1) साहित्यिक स्त्रोत
   (1) मालूशाही 
(2) रमौला गाथा
(3) हुड़की बोल गाथाएँ
(4) जागर
1 देवी-देवताओं के जागर
2 प्रेतबाधा के जागर
3 स्थानीय शासकों के जागर
(5) पावड़े अथवा भड़ौ
(6) पुरातात्विक स्त्रोत

(2) पुरातात्विक साहित्य 
1) पुरातात्विक स्त्रोत
(2) लिखित स्त्रोत

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बाड़वाला एवं देवदुंग की ईष्टका-चितियां (Brick Altars)
प्राचीन उत्तराखण्ड
1) अमोधभूति के सिक्के- अटूड़ से प्राप्त उत्खनित् सामाग्री में अमोज्ञभूति की       रजत मुद्राओं के साथ ही दो स्वर्ण श्लाकाएं भी प्राप्त हुई है।
2) अल्मोड़ा से प्राप्त 4 मुद्राएँ जो ब्रिटिश संग्रहालय लंदन में रखी गई है।        इसके अतिरिक्त कत्यूर घाटी से भी 54 मुद्राएँ प्राप्त हुई है।
3)   कुणिन्द अराध्य छत्रेश्वर अथवा चत्रेश्वर के नाम पर निर्गत मुद्राएँ ।
कुषाणोत्तर काल में मध्य हिमालय के वंश 

कत्यूरीयुग (7वीं शताब्दी ई0-15वीं शताब्दी ई० तक)-
1. बसंतदेव का राजवंश
2.  खर्परदेव का वंश
3. राजनिबंर का राजवंश
4.  सलोणादित्तय का राजवंश
5.  पालवंश
6. काचलदेव का वंश
7. आसंतिदेव का वंश
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उत्तराखण्ड के ऐतिहासिक स्त्रोत
(1) साहित्यिक स्त्रोत
   (1) मालूशाही 
(2) रमौला गाथा
(3) हुड़की बोल गाथाएँ
(4) जागर
1 देवी-देवताओं के जागर
2 प्रेतबाधा के जागर
3 स्थानीय शासकों के जागर
(5) पावड़े अथवा भड़ौ
(6) पुरातात्विक स्त्रोत

(2) पुरातात्विक साहित्य 
1) पुरातात्विक स्त्रोत
(2) लिखित स्त्रोत
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उत्तराखंड का आध्र- ऐतिहासिक काल उत्तराखंड
(1) पुरातात्विक स्त्रोत
(2) लिखित स्त्रोत
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कनखल एवं मायापुर से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों के कारण
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