उत्तराखण्ड का इतिहास जानने के स्त्रोत(Sources of knowing the history of Uttarakhand)

उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand

उत्तराखण्ड का इतिहास जानने के स्त्रोत(Sources of knowing the history of Uttarakhand)
उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand

विभिन्न कालों के आधार पर हम उत्तराखण्ड के इतिहास को तीन भागों में बांट सकते हैं- प्रागैतिहासिक काल, आद्यऐतिहासिक काल और ऐतिहासिक काल  राज्य में ऐसे अनेक पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र अतिप्राचीन काल से मानवीय गतिविधियों से सम्बद्ध रहा है।

उत्तराखण्ड इतिहास का ऐतिहासिक स्रोत

प्राचीन इतिहास से संबंधित जानकारी का भण्डार हमें लोकगाथाओं से भी प्राप्त होता है। जो निम्न हैं- राजुला मालूशाही, रमौला गाथा, पवाड़े, जागर, हुड़की बोल गाथाएं उत्तराखण्ड के इतिहास को दो चरणों प्राग ऐतिहासिक एवं ऐतिहासिक काल में विभाजित किया गया है।
पुरातत्व की दृष्टि से मानव इतिहास का प्राचीनतम चरण पाषाण युग है। जिसे डॉ० मदन मोहन जोशी ने तीन चरणों में बांटा है- निम्न, मध्य और उच्च पुरा पाषाण युग। निम्न पुरा पाषाण युग के उपकरणों की खोज युमना उपत्यका,श्रीनगर में अलकनन्दा के उपत्यका में, पश्चिमी रामगंगा घाटी, अल्मोड़ा, खुटानी नाला से के पी नौटियाल व यशोधर मठपाल द्वारा की गई है।

उत्तराखण्ड के इतिहास को जानने के तीन स्रोत हैं -

  1. साहित्यिक स्त्रोत
  2. पुरातात्विक स्त्रोत
  3. विदेशी यात्रियों के द्वारा विवरण 

उत्तराखण्ड इतिहास का विवरण

1 - साहित्यिक स्त्रोत(Literary Source) 

  • धार्मिक ग्रन्थ(Religious Texts)
  1. उत्तराखण्ड का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। जिसमें इस क्षेत्र के लिए मनीषियों की पूर्ण भूमि या देवभूमि कहा गया है।
  2. ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरेव ब्राह्मण में उत्तराखण्ड को उत्तर का कुरू कहा गया है।
  3. स्कंदपुराण में उत्तराखण्ड को ब्रह्मपुर, खशदेश, उत्तरखण्ड कहा गया है।
  4. स्कंदपुराण में गढ़वाल क्षेत्र को केदारखंड तथा कुमाऊं क्षेत्र को मानसखंड कहा गया है।
  5. स्कंदपुराण में केदारखण्ड और मानसखण्ड को संयुक्त रूप से खशदेश कहा गया है।
  6. स्कंद पुराण में हिमालय क्षेत्र को पांच भागों में बांटा गया है - नेपाल, मानसखण्ड, केदारखण्ड, जालंधर और कश्मीर स्कन्द पुराण में वर्णित है कि नन्दा पर्वत गढ़वाल और कुमाऊँ को विभाजित करता है।
  7. पुराणों में कुमाऊँ को कूर्माचल कहा गया है।
  8. बौद्ध धर्म ग्रन्थों में उत्तराखण्ड को हिमवंत कहा गया है।
  9. महाभारत में गढ़वाल क्षेत्र को स्वर्गभूमि, बद्रिकाश्रम, तपोभूमि कहा गया है।
  10. महाभारत के आदि पर्व में उत्तर कुरू तथा दक्षिण कुरू दो देशों का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है।
  11. केदारखण्ड के अंतर्गत मायाक्षेत्र (हरिद्वार) से हिमालय तक का क्षेत्र आता था तथा मानसखंड के अंतर्गत नंदादेवी पर्वत से कालागिरी तक का क्षेत्र आता था। इन दोनों खण्डों को नंदा देवी पर्वत अलग करता है।
  12. कौशीतकी ब्राह्मण में लिखा है कि वाक्देवी का निवास स्थान बद्रीकाश्रम में था।
  13. श्री व्यास जी ने बद्रीकाश्रम में षष्टिलक्ष संहिता की रचना की थी।
  14. किरातों ने अपने नेता शिव के झण्डे के नीचे अर्जुन से युद्ध (तुमुल संग्राम) किया। इसका उल्लेख हमें केदारखण्ड में मिलता है।
  15. जिस स्थान पर यह युद्ध हुआ वहां आज विल्लव केदार के नाम से प्रसिद्ध तीर्थ बन गया है। विल्लव केदार अलकनन्दा के बाएं तट पर स्थित है जिसे शिवप्रयाग के नाम से जाना जाता है।
  • अधार्मिक ग्रंथ(Irreligious Texts)
  1. पाणिनी की अष्टध्यायी, कालिदास कृत रघुवंशम, मेघदूतम्, कुमारसंभव, बाणभट्ट कृत हर्षचरित, राजशेखर कृत काव्य मीमांसा में उत्तराखण्ड के बारे में जानकारी प्राप्त होती हैं।
  2. कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी में कश्मोर के शासक ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा गढवाल विजय का उल्लेख मिलता है।
  3. उत्तराखण्ड में प्रचलित लोकगाथाओं जैसे जागर इत्यादि भी इतिहास हेतु महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
  4. मुस्लिम ग्रन्थ जहांगीरनामा और तारीख-ए-बदायूंनी में भी उत्तराखण्ड का वर्णन है।
  5. ह्वेसांग ने अपने यात्रा वृतांत सी यू- की में उत्तराखण्ड के लिए पो-लि-ही-मो-पु-लो अर्थात ब्रह्मपुर शब्द का प्रयोग किया है तथा हरिद्वार को मो-यू-लो अर्थात मायानगरी या मयूरनगरी कहा है और इसकी माप 20 ली बतायी।
  6. ह्वेसांग ने अपनी पुस्तक में गोविषाण नामक स्थान का वर्णन किया है। इसकी पुष्टि प्रो० अलेकजेण्डर कनिंघम ने काशीपुर के रूप में की है।
  7. जोशीमठ (ज्योतिषपीठ) से प्राप्त हस्तलिखित ग्रन्थ गुरुपादुक में अनेक शासक और वंशों का उल्लेख प्राप्त होता है।
  8. प्रयाग प्रशस्ति लेख में इस क्षेत्र को कार्तिकेयपुर/ कर्तृपुर कहा गया है।
  9. तालेश्वर से प्राप्त ताम्रपत्रों में कार्तिकेयपुर तथा ब्रह्मपुर शब्द का उल्लेख किया गया है।
  10. उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand

  11. पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्रों में केवल कार्तिकेयपुर शब्द का उल्लेख मिलता है जबकि चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वृतान्त में केवल ब्रह्मपुर शब्द का प्रयोग किया गया है।

2 - पुरातात्विक स्त्रोत(Archaeological Sources)

  •  प्रागैतिहासिक अवशेष(Prehistoric remains)
  1. उत्तराखण्ड में पुरातत्व की खोज का प्रारम्भ हेनवुड ने किया था। हेनवुड द्वारा 1856 में चम्पावत के देवीधुरा नाम को स्थान पर सर्वप्रथम कपमार्क्स उत्खनित किए गए थे।
  2. इसके पश्चात् 1877 में रिवेट कानक द्वाराहाट के चंद्रेश्वर मन्दिर के समीप शैलचित्रों की खोज की जो 12 पंक्तिया में खुदे मिले हैं। रिवेट कार्नक द्वारा द्वाराहाट से प्राप्त शैलचित्रों को यूरोप से प्राप्त शैलचित्रों के समान बताया गया है।
  3. गढ़वाल विश्वविद्यालय को पश्चिमी रामगंगा घाटी के सनणा तथा बसड़ी गांवों (भिकियासैंण) से शवाधान प्राप्त है।
  4. इसी तरह की आकृतियां जसकोट, देवीधुरा, नौला, जैनल, सनणा, बसेड़ी, मुनिया की डाई, जायों ग्राम, गोपेश्वर, पनार घाटी आदि स्थलों से प्राप्त हुई हैं।
  • अल्मोड़ा से प्राप्त स्रोत(Sources from Almora)
लाखु उड्यार(गुफा) (Lakhu Udiyar)
  1. इस उड्यार की खोज 1968 में डॉ० एम पी जोशी द्वारा की गई थी।
  2. यह उड्यार अल्मोड़ा जनपद में अल्मोड़ा से 20 किमी दूर बाड़ेछीना के पास दलबैंड पर स्थित है।
  3. यह सुयाल नदी के दांये तट पर स्थित है।
  4. यहां से मानव तथा पशु पक्षियों के शैलचित्र प्राप्त हुए हैं तथा मानवाकृतियों को अकेले या समूह में नृत्य करते दिखाया गया है।
  5. जानवरों में लोमड़ी व अनेक पैरों वाली छिपकली के चित्र प्राप्त हुये हैं।
  6. इन शैलचित्रों में मानवाकृतियों को रंगों से सजाया गया है।
  7. इन शैलचित्रों में तीन रंगों का प्रयोग किया गया है - सबसे नीचे श्याम, मध्य में कत्थई (लोहित) और ऊपरी भाग में श्वेत रंग का प्रयोग किया गया है।
  8. यह शैलचित्र नागफनी के आकार का है।
  9. डॉ० यशवन्त सिंह कठौच के अनुसार लाखु उड्यार उत्तराखण्ड में प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की पहली खोज थी।
  10. इन चित्रों को ताम्रपाषाणकाल में रखा गया है।
  11. कुछ विद्वान इन चित्रों को भीमबेटिका शैलचित्रों के समान मानते हैं।
  12. राज्य पुरातत्व विभाग ने 1992 में इसे अपने संरक्षण में लिया।
  • फड़कानौली(Phadkanauli)
  1. लाखु उड्यार से आधा किमी पहले फड़कानौली के पास 3 शैलचित्र स्थित है।
  2. प्रथम शैलचित्र की छत नागराज के फन के भांति बाहर निकली है और इसकी दीवारों पर आकृतियों के 20 संयोजन विद्यमान है। दूसरे शैलचित्र में 10 स्थानों पर चित्रण के प्रमाण हैं। तीसरा शैलचित्र सुयाल नदी के तट पर स्थित है।
  3. फड़कानौली की खोज 1985 में यशोधर मठपाल द्वारा की गई।
  • पेटशाला (Petshala)
  1. इस शैलचित्र की खोज 1989 में यशोधर मठपाल द्वारा की गई।
  2. यहां से नृत्यरत मानव आकृतियां प्राप्त हुयी हैं जिन्हें कत्थई रंग से सजाया गया है।
  3. यहां से दो गुफाएं प्राप्त है जिसमें से पहली गुफा 8 मीटर गहरी और 6 मीटर ऊंची है। तथा दूसरी गुफा 4 मीटर ऊंची और 3.10 मीटर गहरी है।
  • फलसीमा(Falseema)
  1. यहां से योगमुद्रा व नृत्यमुद्रा में मानव आकृतियां मिली हैं।
  2. यहां पर एक चट्टान पर दो कप मार्क बनाए गए हैं।
  3. यह अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर उत्तर-पूर्व दिशा में है।
  • ल्वेथाप (Lowethap)
  1. यहां से प्राप्त शैलचित्रों में मानव को शिकार करते हुए तथा हाथों में हाथ डालकर नृत्य करते दिखाया गया है।
  2. लाल रंग के चित्र प्राप्त होने के कारण इसे ल्वेथाप कहा जाता है।
  3. यहां पर तीन शेलचित्र स्थित है।
  4. यह शिलाश्रय अल्मोड़ा बिनसर मार्ग पर ल्वेथाप नामक स्थान पर स्थित है।
  • कसार देवी(Kasaar Devi)
  1. कसार देवी शैलचित्रों में 14 नृतकों का सुन्दर चित्रण किया गया है जो कासय पर्वत की कश्यप चोटी पर स्थित है।
  2. यह स्थान अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर दूरी पर स्थित है 
  • रामगंगा घाटी(Ramganga Ghati)
  1. डॉ. यशोधर मठपाल को यहां से पाषाणकालीन शवागार और ओखली (कपमार्क्स) प्राप्त हुए हैं।
  • धनगल(Dhangal)
  1. कुमाऊँ विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग ने अल्मोड़ा जनपद में बग्वालीपोखर के निकट धनगल गांव से थापली व पुरोला के समान चित्रित धूसर मृदभांड के टुकड़े, पक्की मिट्टी के अनेक खिलौने, ताम्र चूड़ियां व अश्व अस्थियां खोजी हैं।
  2. यहां चित्रित मृदभांड लाल मिट्टी से निर्मित हैं।
  3. यहां कुमाऊँ विश्वविद्यालय द्वारा 1998 में प्रो० एम पी जोशी और डी एस नेगी के संरक्षण में उत्खनन का कार्य प्रारम्भ किया था।
  • चंद्रेश्वर मंदिर द्वाराहाट(Chandreswar Temple)
  1. द्वाराहाट में चन्द्रेश्वर मन्दिर के समीप से ओखलियां (कपमार्क्स) मिली हैं जहां 12 पंक्तियों में 200 कप माकर्स खुदे है।
  2. इनकी खोज रिबेट कार्नक द्वारा 1877 में की गयी।
  3. डॉ० एम पी जोशी द्वारा जसकोट, देवीधुरा आदि स्थानो से से भी कपमार्क्स की खोज की गई है तथा
  4. डॉ० यशोधर मठपाल द्वारा गोपेश्वर के समीप पश्चिमी नयार घाटी से भी कपमार्क्स की खोज की है।
  5. द्वाराहाट को कुमाऊं का खुजराहो कहा जाता है।
  • नैनीपाताल(Nainipatal)
  1. यहां से 1999 में 05 ताम्रमानवाकृतियां प्राप्त की गई हैं।
  • खेखड(Khekhad) 
  1. यहां से 1982 में प्रागैतिहासिक काल के मृदभांड प्राप्त हुये थे।
  2. हथ्वालघोड़ा, कालामाटी, महरू-उड्यार, मल्ला पैनाली, डीनापानी ये सभी स्थान अल्मोड़ा में है।
  3. नोट: महरू उड्यार से भी चित्रित अवशेष प्राप्त हुये हैं।
  4. जाखन देवी मंदिर (Jakhan Devi Temple)
  5. यह मंदिर अल्मोड़ा में स्थित है यह मंदिर यक्षों के बारे मे जानकारी देता है।
चमोली से प्राप्त अवशेष(Residue from Chamoli)
  • ग्वारख्या गुफा(Gwarakhya Cave)
  1. यह शैलचित्र डुंग्री गांव में अलकनन्दा नदी के किनारे स्थित है।
  2. गोरखाओं ने यहां लूट का माल छिपाया था इस कारण इसे ग्वारख्या गुफा कहते हैं।
  3. इसकी खोज राकेश भट्ट द्वारा 1993 में की गई थी।
  4. यहां पीले रंग की धारीदार चट्टान पर गुलाबी व लाल रंग के चित्र अंकित किए गए हैं।
  5. डॉ० मठपाल के अनुसार इन शिलाश्रयों में लगभग 41 आकृतियां हैं जिनमें 33 मानवों की 8 पशुओं की आकृतियां हैं।
  6. यहां मनुष्य को त्रिशूल आकार से अंकित किया गया है।
  7. यहां से मानव भेड़, बारहसिंगा, लोमड़ी आदि के रंगीन चित्र मिले हैं।
  8. पशुओं में बकरीनुमा चित्र काफी प्राकृतिक है।
  9. इन शैलचित्रों का मुख्य विषय पशुचारक संस्कृति या पशुओं का हांका देकर घेरना है।
  • मलारी गांव( Malari Village)
  1. मलारी गांव की गुफा को सर्वप्रथम 1956 ई० शिवप्रसाद डबराल ने खोजा।
  2. डबराल ने यहां से महापाषाणकालीन शवागार खोजे।
  3. इन शवाधानों की आकृति मंडलाकार गर्त जैसी है। जिनमें शव के चारों ओर अनगढ शिलायें खड़ी करके रखी गयी हैं
मलारी गांव

  1. यहां उत्खनन का कार्य सबसे पहले गढवाल विश्व विद्यालय द्वारा 1982-83 में किया गया।
  2. यहां की गुफा अंडाकार थी जिसकी उंचाई 1.15 मीटर व गहराई 3 मी थी।
  3. और इन्हें ऊपर से बड़े बड़े पटालों से ढका गया है।
  4. इन शवाधानों में मानव अवशेषों के साथ अश्व, मेंढ, तश्तरियां, विभिन्न आकार की टोंटी एवं लगभग 15 हत्थेयुक्त कुतुप इत्यादि भी रखे गये हैं। जो इस बात का संकेत है कि इस काल का मनुष्य मृत्यु के बाद भी जीवन को कल्पना करता था।
  5. एक कुतुप के हत्थे पर चमकदार पॉलिस की गयी है और इसके हत्थे पर मोनाल का चित्र अंकित किया गया है।
  6. इन शवाधानों को अ. दानी ने स्वात घाटी की गांधार-शवागार संस्कृति के समान बताया है।
  7. टूसी ने इसी घाटी को दरद समुदाय से संबंधित बताया है। जबकि सांकलिया ने इन्हें आर्यों से जोड़ा है।
  8. डबराल के अनुसार किन्नौर में लिप्पा की समाधियों के समान मलारी के शवाधान मंडलाकार गर्त जैसे थे।
  9. यहां वर्ष 2002 में गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के द्वारा नर कंकाल, मिट्टी के बर्तन, जानवरों के अंग, 5 किग्रा० का एक सोने का मुखौटा व कांसे का कटोरा प्राप्त किया गया।
  10. यहां से आखेट के लिए लौह उपकरणों के साथ पशु का एक संपूर्ण कंकाल भी मिला है।
  • किमनी गांव(Kimani Village)
  1. किमनी थराली के समीप पिंडर नदी के किनारे स्थित है।
  2. चमोली के किमनी गांव में स्थित इस गुफा से सफेद रंग से चित्रित हथियार एवं पशुओं के शैलचित्र मिले हैं।
  3. इस ज्ञात पशु की पहचान अब हिमालयी वृषभ जुबु या जोबा से की गई है।
  4. मलारी गांव से प्राप्त लौह फलक उत्तराखण्ड से प्राप्त लौह उपकरणों में सर्वाधिक प्राचीन है।
  5. यहां से लोहे का एक जार भी प्राप्त हुआ है।
  6. मलारी मारछा जनजाति का गांव है।
हरिद्वार से प्राप्त अवशेष(Residue from Haridwar)
  • बहादराबाद(Bahadrabad)
  1. डॉ० यशवन्त कठौच के अनुसार हरिद्वार के बहादराबाद में खोदते समय 1951 में ताम्र उपकरण व मृदभांड की खोज की गई।
  2. इसी स्थल पर 1953 में यज्ञदत्त शर्मा द्वारा उत्खनन किए जाने के साथ ही पाषाण उपकरणों के साथ वही मृदभांड प्राप्त हुए हैं।
पौढी से प्राप्त अवशेष(Residue from Pauri)
  • थापली(Thapli)
  1. थापली का उत्खनन कार्य एचएनबी(H.N.B) विवि द्वारा के पी नौटियाल के निर्देशन में 1982-83 में किया गया था।
  2. यहां से 1.20 मीटर के चित्रित धूसर मिट्टी के बर्तन मिले हैं। इन मृदभांडों में तश्तरियां व कटोरियां हैं।
  3. चित्रित मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग का प्रयोग किया गया है जिनमें सूर्य, सिग्मा, एक केंद्रीत वृत्त, खड़ी व क्षैतिज रेखायें, पत्तियां, पुष्प आदि चित्र हैं।
  4. यहां से लाल व काले रंग के बर्तन भी प्राप्त हुये हैं।
  5. यहां से प्राचीन वस्तुऐं तांबे की चूड़ियां, आंखों पर काजल लगाने वाली अंजन शलाकाऐं तथा पक्की मिट्टी की बनी चिड़िया उल्लेखनीय हैं।
  6. थापली से धान की खेती करने के अवशेष प्राप्त होते हैं।
  7. थापली अलकनंदा के दाहिने तट पर स्थित है।
  • रणिहाट(Ranihaat)
  1. यह श्रीनगर में अलकनंदा के दाहिने तट पर स्थित है।
  2. इसका उत्खनन भी गढवाल विवि द्वारा के पी नौटियाल के निर्देशन में 1977 में किया गया।
  3. यहां के उत्खनन से ईंटें प्राप्त हुयी हैं।
  4. ईंटों के साथ साथ अस्त्र शस्त्र व मृदभांड भी प्राप्त हुये हैं।
  5. रानीहाट के प्राचीन निवासी स्थानीय कच्चे लोहे को गलाकर लोहे के औजार बनाने में निपुण थे। जो मछली मारने शिकार करने हेतु प्रयुक्त किये जाते थे।
उत्तरकाशी से प्राप्त अवशेष(Residue from Uttarakashi)
  • पुरोला(Purola)
  1. यह यमुना की सहायक कमल नदी के बांये किनारे पर स्थित है।
  2. यहां से काले रंग का आलेख प्राप्त हुआ है जो शंखलिपि में लिखा गया है। जिसको अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।
  3. यहां से भी लाल व काले रंग के बर्तन प्राप्त हुये हैं।
  4. यहां से पक्की मिट्टी के खिलौने व मनके प्राप्त हुये हैं।
  5. यहां से घोड़े की हड्डियों के अवशेष प्राप्त हुये हैं।
  6. पुरोला से एक इष्टिका वेदिका भी प्राप्त हुयी है जिसका आकार उड़ते हुये गरूड़ पक्षी के समान है।
  7. यहां से प्राप्त एक लोहे के फरसे तथा हड्डियों के प्रचुर अवशेषों के आधार पर यह कहा जाता है कि यहां पशुओं की बलि बड़ी संख्या में दी जाती थी।
  • हुडली(Hoodly)
  1. यहां से नीले रंग के शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।
पिथौरागढ से प्राप्त अवशेष(Residue from Pithoragarh)
  • बनकोट(Bankot)
  1. यहां से 8 ताम्र मानवाकृतियां प्राप्त हुई हैं।
चंपावत से प्राप्त अवशेष(Residue from Champawat)
  • देवीधुरा(Devidhura)
  1. चम्पावत के देवीधुरा में पुरातत्व की खोज का प्रारम्भ हैवनहुड(हेनवुड) ने किया। जब उनके द्वारा 1856 में देवीधुरा से पुरापाषाणिक शवाधान की खोज की गई।
  2. यह उत्तराखण्ड के सभी प्रागैतिहासिक अवशेषों में सबसे पहली खोज थी।
ऐतिहासिक काल के स्त्रोत(Historical Sources)
  • कालसी अभिलेख(Kalsi Record)
  1. यह स्थल देहरादून में स्थित है।
  2. कालसी शिलालेख अमलाब नदी के किनारे स्थित है। अमलाव यमुना की सहायक नदी है।
  3. कालसी का प्राचीन नाम कालकूट था। कालसी के अन्य नाम खलतिका व युगशैल भी है।
  4. यहां अशोक का अभिलेख है। जिस शिला पर अभिलेख है उसे कालशिला या चित्रशिला कहा जाता है।
  5. इस अभिलेख की खोज 1860 में फॉरेस्टर ने की थी।
  6. इस अभिलेख की उंचाई 10 फुट व चौड़ाई 8 फुट है।
  7. यह अभिलेख प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है।
  8. कालसी यमुना व टौंस के संगम पर स्थित है जो कुणिन्द राजाओं की राजधानी भी रहा है।
  9. इस अभिलेख में अशोक ने कालकूट क्षेत्र को अपरांत कहा है तथा यहां के निवासियों को पुलिंद कहा है।
  10. इस अभिलेख में अशोक ने हिंसा त्यागकर अहिंसा अपनाने की बात कही है।
  11. सातवीं शताब्दी में कालसी को सुधनगर के रूप में ह्वेंसांग ने देखा था।
  12. यह अशोक का 13 वें कम शिलालेख है।
  13. यहां अशोक के 14 शिलालेख हैं।
  14. इस अभिलेख में हाथी के चित्र का अंकन किया गया है और उसके पैरों के मध्य गजतमे (श्रेष्ठ हाथी)शब्द लिखा गया है। गजतमे संस्कृत भाषा में लिखा गया है। इसमें हाथी को आसमान से उतरते दिखाया गया है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह भगवान बुद्ध का प्रतीक है।
  15. यहां के अभिलेख खंडित अवस्था में हैं। इनका खंडन 1254 में नसिरुद्दीन महमूद ने किया था।
  16. इस लेख में अंत में 5 यवन राजाओं का उल्लेख भी मिलता है।
  • लाखामंडल(Lakhamondal)
  1. यह स्थल देहरादून में स्थित है।
  2. लाखामंडल का प्राचीन नाम मढ था।
  3. लाखामंडल यमुना व रिखनाड़ तथा यमुना व गोदरगाड़ नदियों के संगम पर स्थित है।
  4. लाखेश्वर या लाखामंडल में छत्र युक्त (पैगोडा सदृश) मंदिर स्थापित है।
  5. लाखामंडल गुफा से कत्यूरी राजवंश की राजकुमारी ईश्वरा का अभिलेख प्राप्त हुआ है।
  6. यहां से गुप्तकाल से पूर्व की मूर्तियां भी प्राप्त हुयी हैं। यहां से दो विशाल मूर्तियां भी प्राप्त हुयी हैं जिन्हें अर्जून, भीम या जय विजय भी कहा जाता है।
  7. यहां से ब्राह्मी लिपि में श्लोक बद्ध संस्कृत लेख भी प्राप्त हुआ है।
  8. लाखामंडल लेख में उत्तराखंड को सिंहपुर कहा गया है।
  • अम्बाड़ी(Ambadi)
  1. यह स्थान देहरादून में स्थित है। यहां से भद्रमित्र शुंग का अभिलेख मिला है।
  • त्रिशूल अभिलेख( Trishul Record)
  1. त्रिशूल अभिलेख शंख लिपि में लिखा गया है।
  2. राज्य में गोपेश्वर (गोपीनाथ मन्दिर) व बाड़ाहाट (शक्ति मन्दिर) से त्रिशूल लेख मिले हैं।
  3. गोपेश्वर से प्राप्त लेख में विशुनाग (नाग वंश) व अशोक चल्ल (नेपाली शासक) तथा बाड़ाहाट से प्राप्त लेख में गुहनाग (नागवंश) व अशोक चल्ल के नाम मिले हैं।
अल्मोडा से प्राप्त सिक्के(Coins from Almora)
  1. ये कुणिन्द शासकों से सम्बन्धित हैं।
  2. अल्मोड़ा व बागेश्वर की सीमा पर 1979 में कत्यूरघाटी से 15 सिक्के प्राप्त हुये।
  3. इन सिक्कों पर निम्न राजाओं के नाम अंकित हैं- शिवदत्त, शिवपालित, हरिदत्त, मार्गभूति, आशेक,
  4. गोमित्र।
  5. ये हिमालय क्षेत्र की पहली मुद्रा थी।
  6. ये सिक्के राजकीय संग्रहालय अल्मोड़ा में रखे गए हैं। बताया जाता है कि इसके अलावा यह सिक्के अल्मोड़ा के बाद फिर ब्रिटेन के संग्रहालय (अल्बर्ट म्यूजियम) में संरक्षित हैं।
  7. वीरभद्र (ऋषिकेश) नामक स्थान से भी ऐतिहासिक काल के अवशेष प्राप्त हुये हैं।
  8. इस स्थल का उत्खनन 1973-74 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने किया। उत्खनन में कुषाणकालीन भवन, सिक्के व मृदभांड प्राप्त हुये हैं।
  9. गढवाल वि वि ने मोरध्वज (1979-81) तथा पांडुवाला पौढी (1983) का उत्खनन किया।
  10. मोरध्वज से बुद्ध की योगासन मुद्रा में बोधिसत्व प्रतिमाऐं प्राप्त हुयी हैं। जिनसे पता चलता है कि यहां बौद्ध धर्म का प्रभुत्व था। इसके अलावा कृष्ण की केशिवध मूर्ति भी प्राप्त हुयी है।
  11. मरखाम ने 1887 में मोरध्वज का उत्खनन किया। यहां से 23 अंडाकार मृणफलकों की खोज की गयी। यहां से आठ मृणमुद्रायें भी प्राप्त हुयी हैं।
  12. नैनीताल तथा देहरादून के बाड़ावाला से ईंटों पर लेख उत्कीर्ण मिले हैं।
  13. बागेश्वर लेख से कत्यूरी काल के राजा बसंत देव, खर्परदेव, राजा निंबर के वंशों की जानकारी प्राप्त होती है।
  14. टिहरी के पलेठी से प्राप्त अभिलेख से नागवंश की जानकारी प्राप्त होती है।
  15. बास्ते ताम्रपत्र (पिथौरागढ़) से गोरखा सेनानायक मोहनथापा का उल्लेख मिलता है। यह ताम्रपत्र आनंदपाल का है।
  16. पुरातात्विक एवं साहित्यिक साक्ष्य उत्तराखण्ड राज्य में आद्यऐतिहासिक काल में नगर होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
  17. उस समय गोविषाण (काशीपुर), गंगाद्वार (हरिद्वार), कनखल, शत्रुध्न, कालकूट, सुबाहु की राजधानी श्रीनगर नगरी स्थिति में थे।
  18. गोविषाण से उत्खनन में 2600 ई०पू० की ईंटें प्राप्त की गई हैं।
  19. कनखल एवं मायापुर से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों के कारण हरिद्वार को गेरूए रंग की सभ्यता का नगर कहा गया है।

3 - आद्यऐतिहासिक काल के स्रोत (Sources of Protohistoric period)

  1. प्राकृतिक सुविधाओं के साथ-साथ उत्तराखण्ड क्षेत्र आध्यात्मिक रूप से भी आर्य सभ्यता व संस्कृति का केन्द्र रहा है।
  2. माना जाता है कि पृथ्वी में जलप्लावन के पश्चात् जिस स्थान पर जीवन की उत्पत्ति हुई वह स्थान उत्तरखण्ड में अल्कापुरी के समीप ब्रहमावर्त (माणा) के अति निकट है ओर आदि मानव ने यहीं से जीवन प्रारम्भ किया था।
  3. बद्रीनाथ के समीप पांच गुफाएं हैं (गणेश, नारद, स्कंद, मुचकुंद व व्यास)। ये वही गुफाएं हैं जहां वेदों व पुराणों की रचना हुई।
  4. मनु के बारे में कहा जाता है कि वे माणा आये थे। उन्होंने जिस भूमि पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया उसे मनु के नाम पर मानसखंड कहा गया।
  5. उत्तराखण्ड का उल्लेख प्रारम्भिक धर्मग्रन्थों में भी मिलता है जहां पर केदारखण्ड (मायाक्षेत्र से हिमालय तक का विस्तृत क्षेत्र) का जिक्र वर्तमान गढ़वाल के लिए तथा मानसखण्ड ( नन्दा देवी पर्वत से कालागिरी तक का विस्तृत क्षेत्र) का जिक्र वर्तमान कुमाऊँ के लिए किया गया है।
  6. वर्तमान में दोनों को संयुक्त रूप से देवभूमि के नाम से जाना जाता है।
  7. लोककथाओं के आधार पर पाण्डव यहां पर आये थे और महाभारत और रामायण की रचना यहीं पर हुई थी।
  8. कालिदास ने अपने महाकाव्य के मंगल-श्लोक में हिमालय की वन्दना कर नगाधिराज को देवात्मा एवं पृथ्वी का मानदंड कहा है।
  9. पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार उत्तराखण्ड सहित हिमालय के पार के प्रदेश तिब्बत का प्राचीन नाम उत्तर कुरू एवं मेरठ- हस्तिनापुर का नाम दक्षिण कुरू था। सम्भवतः इन दो प्रदेशों के जोड़ने वाले बीच के क्षेत्र उत्तराखण्ड का नाम कारूपथ पड़ा।
  10. पुराणों के अनुसार यहां पर यक्ष, किन्नर, खश, किरात आदि प्राचीन समुदाय के लोग निवास करते थे।
  11. उत्तराखण्ड हिमालय का प्रमुख भाग है। आज उत्तराखण्ड दो मण्डलों में सिमट कर रह गया है। लेकिन उत्तराखण्ड कत्यूरी, चंद, पवार राजवंश, टिहरी रियासत, गोरखाराज और अंग्रेजों के शासनाधीन रहा है।

उत्तराखण्ड का इतिहास ऐतिहासिक घटनाएँ

    उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand
  1. 1724 कुमाऊं रेजिमेंट की स्थापना।
  2. 1815 पवांर नरेश द्वारा टिहरी की स्थापना।
  3. 1816 सिंगोली संधि के अनुसार आधा गढ़वाल अंग्रेजों को दिया गया।
  4. 1834 अंग्रेज़ अधिकारी ट्रेल ने हल्द्वानी नगर बसाया।
  5. 1840 देहरादून में चाय के बाग़ान का प्रारम्भ।
  6. 1841 नैनीताल नगर की खोज।
  7. 1847 रूढ़की इन्जीनियरिंग कालेज की स्थापना।
  8. 1850 नैनीताल में प्रथम मिशनरी स्कूल खुला।
  9. 1852 रूढ़की में सैनिक छावनी का निर्माण।
  10. 1854 रूढ़की गंग नहर में सिंचाई हेतु जल छोडा गया।
  11. 1857 टिहरी नरेश सुदर्शन शाह ने काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोंद्धार किया गया।
  12. 1860 देहरादून में अशोक शिलालेख की खोज। नैनीताल बनी ग्रीष्मकालीन राजधानी।
  13. 1861 देहरादून, सर्वे ऑफ़ इंडिया की स्थापना।
  14. 1865 देहरादून में तार सेवा प्रारम्भ।
  15. 1874 अल्मोड़ा नगर में पेयजल ब्यवस्था का प्रारम्भ।
  16. 1877 महाराजा द्वारा प्रतापनगर की स्थापना।
  17. 1878 गढ़वाल के वीर सैनिक बलभद्र सिंह को ’आर्डर आफ़ मेरिट’ प्रदान किया गया।
  18. 1887 लैन्सडाउन में गढ़वाल राइफ़ल रेजिमेंट का गठन।
  19. 1888 नैनीताल में सेंट जोजेफ़ कालेज की स्थापना।
  20. 1891 हरिद्वार - देहरादून रेल मार्ग का निर्माण।
  21. 1894 गोहना ताल टूटने से श्रीनगर में क्षति।
  22. 1896 महाराजा कीर्ति शाह ने कीर्तिनगर का निर्माण।
  23. 1897 कोटद्वार - नज़ीबाबाद रेल सेवा प्रारम्भ।
  24. 1899 काठगोदाम रेलसेवा से जुड़ा।
  25. 1900 हरिद्वार - देहरादून रेलसेवा प्रारम्भ।
  26. 1903 टिहरी नगर में बिद्युत ब्यवस्था।
  27. 1905 देहरादून एयरफ़ोर्स आफ़िस में एक्स-रे संस्थान की स्थापना।
  28. 1912 भवाली में क्षय रोग अस्पताल की स्थापना, मंसूरी में विद्युत योजना।
  29. 1914 गढ़वाली वीर, दरबान सिंह नेगी को विक्टोरिया क्रास प्रदान किया गया।
  30. 1918 सेठ सूरजमल द्वारा ऋषिकेश में ’लक्ष्मण झूला’ का निर्माण।
  31. 1922 गढ़वाल राइफ़ल्स को ’रायल’ से सम्मानित किया गया, नैनीताल विद्युत प्रकाश में नहाया।
  32. 1926 हेमकुण्ड साहिब की खोज।
  33. 1930 चन्द्रशेखर आज़ाद का दुगड्डा में अपने साथियों के साथ शस्त्र प्रशिक्षण हेतु आगमन। देहरादून में नमक सत्याग्रह, मंसूरी मोटर मार्ग प्रारम्भ।
  34. 1932 देहरादून मे "इंडियन मिलिटरी एकेडमी" की स्थापना।
  35. 1935 ऋषिकेश - देवप्रायाग मोटर मार्ग का निर्माण।
  36. 1938 हरिद्वार - गोचर हवाई यात्रा ’हिमालयन एयरवेज कम्पनी’ ने शुरू की।
  37. 1942 7वीं गढवाल रेजिमेंट की स्थापना।
  38. 1945 हैदराबाद रेजिमेंट का नाम बदलकर "कुमाऊं रेजिमेंट" रखा गया।
  39. 1946 डी.ए.वी. कालेज देहरादून में कक्षाएं शुरू हुई।
  40. 1948 रूढ़की इन्जीनियरिंग कालेज - विश्वविद्यालय में रूपांतरित किया गया।
  41. 1949 टिहरी रियासत उत्तर प्रदेश में विलय। अल्मोडा कालेज की स्थापना।
  42. 1953 बंगाल सैपर्स की स्थापना रूढ़की में की गई।
  43. 1954 हैली नेशनल पार्क का नाम बदलकर जिम कार्बेट नेशनल पार्क रखा गया।
  44. 1958 मंसूरी में डिग्री कालेज की स्थापना।
  45. 1960 पंतनगर में कृषि एवं प्रोद्यौगिकी विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गई।
  46. 1973 गढ़वाल एवं कुमांऊ विश्वविद्यालय की घोषणा की गई।
  47. 1975 देहरादून प्रशासनिक रूप से गढ़वाल में सम्मिल्लित किया गया।
  48. 1982 चमोली जनपद में 87 कि.मी. में फैली फूलों की घाटी को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
  49. 1986 पिथौरागढ़ जनपद के 600 वर्ग कि.मी. में फैले अस्कोट वन्य जीव विहार की घोषणा की गई।
  50. 1987 पौड़ी गढ़वाल में 301 वर्ग कि.मी. में फैले सोना-चांदी वन्य जीव विहार की घोषणा की गई।
  51. 1988 अल्मोडा वनभूमि के क्षेत्र बिनसर वन्य जीव विहार की घोषणा की गई।
  52. 1991 20 अक्तूबर को भूकम्प में 1500 व्यक्तियों की मौत।
  53. 1992 उत्तरकाशी में गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान तथा गोविंद राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना।
  54. 1994 उत्तराखण्ड प्रथक राज्य के मांग - खटीमा में गोली चली। अनेक व्यक्तियों की मौत।
  55. 1994        मुजफ़्फ़रनगर काण्ड।
  56. 1995 श्रीनगर में आंदोलनकारियों पर गोली चली।
  57. 1996 रुद्रप्रयाग, चम्पावत, बागेश्वर व उधमसिंह नगर, चार नये जनपद बनाये गये।
  58. 1999 चमोली में भूकम्प। 110 व्यक्तियों की मौत।
  59. 2000 9 नबम्बर को उत्तराखंड राज्य की स्थापना हुई।

गोरखा शासन से राज्य स्थापना तक का घटना क्रम

    उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand
  1. उत्तराखंड में ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन 1815 में हुआ। वास्तव में यहां अंग्रेजों का आगमन गोरखों के 25 वर्षीय सामन्ती सैनिक शासन का अंत भी था।
  2. 1815 से 1857 तक यहां कंपनी का शासन का दौर सामान्यतः शान्त और गतिशीलता से बंचित शासन के रूप में जाना जाता है। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में आने के बाद यह क्षेत्र ब्रिटिश गढवाल कहलाने लगा था। किसी प्रबल विरोध के अभाव मे अविभाजित गढवाल के राजकुमार सुदर्शनशाह को कंपनी ने आधा गढ़वाल देकर मना लिया परन्तु चंद शासन के उत्तराधिकारी यह स्थिति भी न प्राप्त कर सके।
  3. 1856-1884 तक उत्राखंड हेनरी रैमजे के शासन में रहा तथा यह युग ब्रिटिश सत्ता के शक्तिशाली होने के काल के रूप में पहचाना गया। इसी दौरान सरकार के अनुरूप समाचारों का प्रस्तुतीकरण करने के लिये 1868 में समय विनोद तथा 1871 में अल्मोड़ा अखबार की शुरूआत हुयी। 1905 मे बंगाल के विभाजन के बाद अल्मोडा के नंदा देवी नामक स्थान पर विरोध सभा हुयी। इसी वर्ष कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में उत्तराखंड से हरगोविन्द पंत, मुकुन्दीलाल, गोविन्द बल्लभ पंत बदरी दत्त पाण्डे आदि युवक भी सम्मिलित हुये।
  4. 1906 में हरिराम त्रिपाठी ने वन्देमातरम् जिसका उच्चारण ही तब देशद्रोह माना जाता था उसका कुमाऊँनी अनुवाद किया। भारतीय स्वतंत्रता आंन्देालन की एक इकाइ के रुप् मे उत्तराखंड में स्वाधीनता संग्राम के दौरान 1913 के कांग्रेस अधिवेशन में उत्तराखंड के ज्यादा प्रतिनिधि सम्मिलित हुये। इसी वर्ष उत्तराखंड के अनुसूचित जातियों के उत्थान के लिये गठित टम्टा सुधारिणी सभा का रूपान्तरण एक व्यापक शिल्पकार महासभा के रूप में हुआ।
  5. 1916 के सितम्बर माह में हरगोविन्द पंत गोविन्द बल्लभ पंत बदरी दत्त पाण्डे इन्द्रलाल साह मोहन सिंह दड़मवाल चन्द्र लाल साह प्रेम बल्लभ पाण्डे भोलादत पाण्डे ओर लक्ष्मीदत्त शास्त्री आदि उत्साही युवकों के द्वारा कुमाऊँ परिषद की स्थापना की गयी जिसका मुख्य उद्देश्य तत्कालीन उत्तराखंड की सामाजिक तथा आर्थिक समस्याआं का समाधान खोजना था। 1926 तक इस संगठन ने उत्तराखण्ड में स्थानीय सामान्य सुधारो की दिशा के अतिरिक्त निश्चित राजनैतिक उद्देश्य के रूप में संगठनात्मक गतिविधियां संपादित कीं। *1923 तथा 1926 के प्रान्तीय काउन्सिल के चुनाव में गोविन्द बल्लभ पंत हरगोविन्द पंत मुकुन्दी लाल तथा बदरी दत्त पाण्डे ने प्रतिपक्षियों को बुरी तरह पराजित किया। 1926 में कुमाऊँ परिषद का कांग्रेस में विलीनीकरण कर दिया गया।
  6. 1926 में कुमाऊँ परिषद का कांग्रेस में विलीनीकरण कर दिया गया। 1927 में साइमन कमीशन की घोषणा के तत्काल बाद इसके विरोध में स्वर उठने लगे और जब 1928 में कमीशन देश मे पहुचा तो इसके विरोध में 29 नवम्बर 1928 को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में 16 व्यक्तियों की एक टोली ने विरोध किया जिस पर घुडसवार पुलिस ने निर्ममता पूर्वक डंडो से प्रहार किया। जवाहरलाल नेहरू को बचाने के लिये गोविन्द बल्लभ पंत पर हुये लाठी के प्रहार के शारीरिक दुष्परिणाम स्वरूप वे बहुत दिनों तक कमर सीधी नहीं कर सके थे। भारतीय गणतन्त्र में टिहरी राज्य का विलय अगस्त १९४९ में हुआ और टिहरी को तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (उ.प्र.) का एक जिला घोषित किया गया। १९६२ के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठ भूमि में सीमान्त क्षेत्रों के विकास की दृष्टि से सन १९६० में तीन सीमान्त जिले उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ का गठन किया गया। 

मध्यकाल में उत्तराखण्ड

कत्युरी राजा वीर देव के पश्चात कत्युरियों के साम्राज्य का पूर्ण विभाजन हो गया तथा यह न केवल अपनी जाति के अपितु कुछ बाहरी कबीलों के भी अधीन बट गया। गढ़वाल का एक बहुत बड़ा भाग कत्युरियों के हाथों से निकल गया तथा शेष कुमाऊण्ण् क्षेत्र छह कबीलों में बँट गया। तत्पश्चात कतुरिस साम्राज्य को नेपाली राजाओं अहोकछला (११९१ ईस्वी) तथा कराछला देव (१२२३ ईस्वी) ने अपने राज्य में मिला लिया। यह दोनों आक्रमण विभिन्न कबीलों में परस्पर शत्रुता के कारण निर्णायक सावित हुए। तत्पश्चात संपूर्ण साम्राज्य ६४ अथवा कुछ मतों के अनुसार ५२ गढ़ों में विभाजित हो गया। इन सभी गढ़ों के सरदार अक्सर आपस में झगड़ते रहते थे। सोलहवी शताब्दी के प्रारंभ में कनक पाल के वंशज अजय पाल ने जो की चांदपुर गढ़ी कबीलों का सरदार था, सम्पूर्ण गढ़वाल को एक कर दिया।
पांडुकेश्वर की तांबे की प्लेटें (ताम्रपत्र) दर्शाती हैं कि इस बेराज की राजधानी कार्तिकेयपुरा नीति-माना घाटी में और आगे चलकर कात्यूर घाटी में स्थित थी। एटकिंशन ने काबुल की घाटी से इस वंशज की उत्पत्ति का पता लगाया तथा उनकों काटोरों से जोड़ा।
गैरौला और नौटियाल के अनुसार, कात्यूरी छोटी खासा जनजाति थी जो मूलतः गढ़वाल के उत्तर में जोशीमठ में रहती थी तथा बाद में कुमाऊं की कात्यूर घाटी में चली गई। कात्यूरियों ने पौरवों और तिब्बती हमलावरों के पतन के बाद अपनी ताकत बढ़ाई तथा ७ वीं शताब्दी के अन्त और ८ वीं शताब्दी के आरम्भ में वे स्वतन्त्र हो गए।

कुमाऊँ का इतिहास

प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में कुमाऊँ को मानसखण्ड कहा गया। अक्टूबर १८१५ में डब्ल्यू जी ट्रेल ने गढ़वाल तथा कुमाऊँ कमिश्नर का पदभार संभाला। उनके पश्चात क्रमशः बैटन, बैफेट, हैनरी, रामसे, कर्नल फिशर, काम्बेट, पॉ इस डिवीजन के कमिश्नर आये तथा उन्होंने भूमि सुधारो, निपटारो, कर, डाक व तार विभाग, जन सेहत, कानून की पालना तथा क्षेत्रीय भाषाओं के प्रसार आदि जनहित कार्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। अंग्रेजों के शासन के समय हरिद्वार से बद्रीनाथ और केदारनाथ तथा वहां से कुमाऊँ के रामनगर क्षेत्र की तीर्थ यात्रा के लिये सड़क का निर्माण हुआ और मि. ट्रैल ने १८२७-२८ में इसका उदघाटन कर इस दुर्गम व शारीरिक कष्टों को आमंत्रित करते पथ को सुगम और आसान बनाया। कुछ ही दशकों में गढ़वाल ने भारत में एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया तथा शूरवीर जातियों की धरती के रूप में अपनी पहचान बनाई। लैण्डसडाउन नामक स्थान पर गढ़वाल सैनिकों की 'गढ़वाल राइफल्स' के नाम से दो रेजीमेंटस स्थापित की गईं। निःसंदेह आधुनिक शिक्षा तथा जागरूकता ने गढ़वालियों को भारत की मुख्यधारा में अपना योगदान देने में बहुत सहायता की। उन्होंने आजादी के संघर्ष तथा अन्य सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया। आजादी के पश्चात १९४७ ई. में गढ़वाल उत्तर प्रदेश का एक जिला बना तथा २००१ में उत्तराखण्ड राज्य का जिला बना। 

अल्मोड़ा का इतिहास

 प्राचीन अल्मोड़ा कस्बा, अपनी स्थापना से पहले कत्यूरी राजा बैचल्देओ के अधीन था। उस राजा ने अपनी धरती का एक बड़ा भाग एक गुजराती ब्राह्मण श्री चांद तिवारी को दान दे दिया। बाद में जब बारामण्डल चांद साम्राज्य का गठन हुआ, तब कल्याण चंद द्वारा १५६८ में अल्मोड़ा कस्बे की स्थापना इस केन्द्रीय स्थान पर की गई। कल्याण चंद द्वारा।तथ्य वांछित चंद राजाओं के समय मे इसे राजपुर कहा जाता था। 'राजपुर' नाम का बहुत सी प्राचीन ताँबे की प्लेटों पर भी उल्लेख मिला है। 

नैनीताल का इतिहास

 एक पौराणिक कथा के अनिसार दक्ष प्रजापति की पुत्री उमा का विवाह शिव से हुआ था। शिव को दक्ष प्रजापति पसन्द नहीं करते थे, परन्तु यह देवताओं के आग्रह को टाल नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह न चाहते हुए भी शिव के साथ कर दिया था। एक बार दक्ष प्रजापति ने सभी देवताओं को अपने यहाँ यज्ञ में बुलाया, परन्तु अपने दामाद शिव और बेटी उमा को निमान्त्रण तक नहीं दिया। उमा हठ कर इस यज्ञ में पहुँची। जब उसने हरिद्वार स्थित कनरवन में अपने पिता के यज्ञ में सभी देवताओं का सम्मान और अपने पति और अपनी निरादर होते हुए देखा तो वह अत्यन्त दु:खी हो गयी। यज्ञ के हवनकुण्ड में यह कहते हुए कूद पड़ी कि 'मैं अगले जन्म में भी शिव को ही अपना पति बनाऊँगी। 

अपने मेरा और मेरे पति का जो निरादर किया इसके प्रतिफल - स्वरुप यज्ञ के हवन - कुण्ड में स्यवं जलकर आपके यज्ञ को असफल करती हूँ।' जब शिव को यह ज्ञात हुआ कि उमा सति हो गयी, तो उनके क्रोध का पारावार न रहा। उन्होंने अपने गणों के द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट - भ्रष्ट कर डाला। सभी देवी - देवता शिव के इस रौद्र - रुप को देखकर सोच में पड़ गए कि शिव प्रलय न कर ड़ालें। इसलिए देवी - देवताओं ने महादेव शिव से प्रार्थना की और उनके क्रोध को शान्त किया। दक्ष प्रजापति ने भी क्षमा माँगी। शिव ने उनको भी आशीर्वाद दिया। परन्तु, सति के जले हुए शरीर को देखकर उनका वैराग्य उमड़ पड़ा। उन्होंने सति के जले हुए शरीर को कन्धे पर डालकर आकाश - भ्रमण करना शुरु कर दिया। ऐसी स्थिति में जहाँ - जहाँ पर शरीर के अंग गिरे वहाँ - वहाँ पर शक्ति पीठ हो गए। जहाँ पर सती के नयन गिरे थे ; वहीं पर नैनादेवी के रुप में उमा अर्थात् नन्दा देवी का भव्य स्थान हो गया। आज का नैनीताल वही स्थान है, जहाँ पर उस देवी के नैन गिरे थे। नयनों की अश्रुधार ने यहाँ पर ताल का रुप ले लिया। तबसे निरन्तर यहाँ पर शिवपत्नी नन्दा (पार्वती) की पूजा नैनादेवी के रुप में होती है। 

पिथौरागढ़ का इतिहास

यहां के निकट एक गांव में मछली एवं घोंघो के जीवाश्म पाये गये हैं जिससे इंगित होता है कि पिथौरागढ़ का क्षेत्र हिमालय के निर्माण से पहले एक विशाल झील रहा होगा। हाल-फिलहाल तक पिथौरागढ़ में खास वंश का शासन रहा है, जिन्हें यहां के किले या कोटों के निर्माण का श्रेय जाता है।

पिथौरागढ़ के आसपास्द चार कोटें हैं जो भाटकोट, डूंगरकोट, उदयकोट तथा ऊंचाकोट हैं। खास वंश के बाद यहां कचूडी वंश (पाल-मल्लासारी वंश) का शासन हुआ तथा इस वंश का राजा अशोक मल्ला, बलबन का समकालीन था। इसी अवधि में राजा पिथौरा द्वारा पिथौरागढ़ स्थापित किया गया तथा इसी के नाम पर पिथौरागढ़ नाम भी पड़ा। इस वंश के तीन राजाओं ने पिथौरागढ़ से ही शासन किया तथा निकट के गांव खङकोट में उनके द्वारा निर्मित ईंटो के किले को वर्ष १५६० में पिथौरागढ़ के तत्कालीन जिलाधीश ने ध्वस्त कर दिया। वर्ष १६२२ से आगे पिथौरागढ़ पर चंद वंश का आधिपत्य रहा।

पिथौरागढ़ के इतिहास का एक अन्य विवादास्पद वर्णन है। एटकिंस के अनुसार, चंद वंश के एक सामंत पीरू गोसाई ने पिथौरागढ़ की स्थापना की।

चंदों ने अधिकांश कुमाऊँ पर अपना अधिकार विस्तृत कर लिया जहां उन्होंने वर्ष १७९० तक शासन किया। उन्होंने कई कबीलों को परास्त किया तथा पड़ोसी राजाओं से युद्ध भी किया ताकि उनकी स्थिति सुदृढ़ हो जाय। वर्ष १७९० में, गोरखियाली कहे जाने वाले गोरखों ने कुमाऊँ पर अधिकार जमाकर चंद वंश का शासन समाप्त कर दिया।

वर्ष १८१५ में गोरखा शासकों के शोषण का अंत हो गया जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें परास्त कर कुमाऊँ पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। एटकिंस के अनुसार, वर्ष १८८१ में पिथौरागढ़ की कुल जनसंख्या ५५२ थी। अंग्रेज़ों के समय में यहां एक सैनिक छावनी, एक चर्च तथा एक मिशन स्कूल था। इस क्षेत्र में क्रिश्चियन मिशनरी बहुत सक्रिय थे। वर्ष १९६० तक अंग्रजों की प्रधानता सहित पिथौरागढ़, अल्मोड़ा जिले का एक तहसील था जिसके बाद यह एक जिला बना। वर्ष १९९७ में पिथौरागढ़ के कुछ भागों को काटकर एक नया जिला चंपावत बनाया गया तथा इसकी सीमा को पुनर्निर्धारित कर दिया गया। वर्ष २००० में पिथौरागढ़ नये राज्य उत्तराखण्ड का एक भाग बन गया।

टिहरी गढ़वाल का इतिहास

 टिहरी और गढ़वाल दो अलग नामों को मिलाकर इस जिले का नाम रखा गया है। जहाँ टिहरी बना है शब्‍द ‘त्रिहरी’ से, जिसका अर्थ है एक ऐसा स्‍थान जो तीन प्रकार के पाप (जो जन्‍मते है मनसा, वचना, कर्मा से) धो देता है वहीं दूसरा शब्‍द बना है ‘गढ़’ से, जिसका मतलब होता है किला। सन्‌ ८८८ से पूर्व सारा गढ़वाल क्षेत्र छोटे छोटे ‘गढ़ों’ में विभाजित था, जिनमें अलग-अलग राजा राज्‍य करते थे जिन्‍हें ‘राणा’, ‘राय’ या ‘ठाकुर’ के नाम से जाना जाता था। ऐसा कहा जाता है कि मालवा के राजकुमार कनकपाल एक बार बद्रीनाथ जी (जो वर्तमान चमोली जिले में है) के दर्शन को गये जहाँ वो पराक्रमी राजा भानु प्रताप से मिले। राजा भानु प्रताप उनसे काफी प्रभावित हुए और अपनी इकलौती बेटी का विवाह कनकपाल से करवा दिया साथ ही अपना राज्‍य भी उन्‍हें दे दिया। धीरे-धीरे कनकपाल और उनकी आने वाली पीढ़ियाँ एक-एक कर सारे गढ़ जीत कर अपना राज्‍य बड़ाती गयीं। इस प्रकार सन्‌ १८०३ तक सारा (९१८ वर्षों में) गढ़वाल क्षेत्र इनके अधिकार में आ गया। उन्‍ही वर्षों में गोरखाओं के असफल हमले (लंगूर गढ़ी को अधिकार में लेने का प्रयास) भी होते रहे, लेकिन सन्‌ १८०३ में आखिर देहरादून की एक लड़ाई में गोरखाओं की विजय हुई जिसमें राजा प्रद्वमुन शाह मारे गये। लेकिन उनके शाहजादे (सुदर्शन शाह) जो उस समय छोटे थे वफादारों के हाथों बचा लिये गये। 
    उत्तराखण्ड का इतिहास | History of Uttarakhand
धीरे-धीरे गोरखाओं का प्रभुत्‍व बढ़ता गया और इन्‍होनें लगभग १२ वर्षों तक राज किया। इनका राज्‍य कांगड़ा तक फैला हुआ था, फिर गोरखाओं को महाराजा रणजीत सिंह ने कांगड़ा से निकाल बाहर किया। और इधर सुदर्शन शाह ने इस्‍ट इंडिया कम्‍पनी की मदद से गोरखाओं से अपना राज्‍य पुनः छीन लिया। ईस्‍ट इण्डिया कंपनी ने फिर कुमाऊँ, देहरादून और पूर्व गढ़वाल को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला दिया और पश्‍चिम गढ़वाल राजा सुदर्शन शाह को दे दिया जिसे तब टेहरी रियासत के नाम से जाना गया। राजा सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी टिहरी या टेहरी नगर को बनाया, बाद में उनके उत्तराधिकारी प्रताप शाह, कीर्ति शाह और नरेन्‍द्र शाह ने इस राज्‍य की राजधानी क्रमशः प्रताप नगर, कीर्ति नगर और नरेन्‍द्र नगर स्‍थापित की। इन तीनों ने १८१५ से सन्‌ १९४९ तक राज किया। तब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहाँ के लोगों ने भी बहुत बढ़चढ़ कर भाग लिया। स्वतन्त्रता के बाद, लोगों के मन में भी राजाओं के शासन से मुक्‍त होने की इच्‍छा बलवती होने लगी। महाराजा के लिये भी अब राज करना कठिन होने लगा था। और फिर अंत में ६० वें राजा मानवेन्‍द्र शाह ने भारत के साथ एक हो जाना स्वीकर कर लिया। 
इस प्रकार सन्‌ १९४९ में टिहरी राज्‍य को उत्तर प्रदेश में मिलाकर इसी नाम का एक जिला बना दिया गया। बाद में २४ फ़रवरी १९६० में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी एक तहसील को अलग कर उत्तरकाशी नाम का एक और जिला बना दिया।
उत्तराखण्ड भारत का 27वां राज्य है जिसका गठन वर्ष 9 नवम्बर, 2000 में किया गया। उत्तराखण्ड भाषाई दृष्टि से मुख्यतया दो भागों से मिलकर गठित हुआ है। एक भाग में कुमांउ मण्डल जिसके अंतर्गत अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, चम्पावत, बागेश्वर और उधम सिंह नगर जनपद हैं तथा दूसरा भाग गढ़वाल मण्डल जिसके अंतर्गत पौड़ी गढ़वाल, टिहरी, उत्तराकाशी, चमोली, रुदप्रयाग, हरिद्वार और देहरादून जनपद आते हैं इसके अतिरिक्त एंगलो इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व भी विधान सभा में है|

  1. उत्तराखंड का इतिहास Uttarakhand history
  2. उत्तराखण्ड(उत्तरांचल) राज्य आंदोलन (Uttarakhand (Uttaranchal) Statehood Movement )
  3. उत्तराखंड में पंचायती राज व्यवस्था (Panchayatiraj System in Uttarakhand)
  4. उत्तराखंड राज्य का गठन/ उत्तराखंड का सामान्य परिचय (Formation of Uttarakhand State General Introduction of Uttarakhand)
  5. उत्तराखंड के मंडल | Divisions of Uttarakhand
  6. उत्तराखण्ड का इतिहास जानने के स्त्रोत(Sources of knowing the history of Uttarakhand)
  7. उत्तराखण्ड में देवकालीन शासन व्यवस्था | Vedic Administration in Uttarakhand
  8. उत्तराखण्ड में शासन करने वाली प्रथम राजनैतिक वंश:कुणिन्द राजवंश | First Political Dynasty to Rule in Uttarakhand:Kunind Dynasty
  9. कार्तिकेयपुर या कत्यूरी राजवंश | Kartikeyapur or Katyuri Dynasty
  10. उत्तराखण्ड में चंद राजवंश का इतिहास | History of Chand Dynasty in Uttarakhand
  11. उत्तराखंड के प्रमुख वन आंदोलन(Major Forest Movements of Uttrakhand)
  12. उत्तराखंड के सभी प्रमुख आयोग (All Important Commissions of Uttarakhand)
  13. पशुपालन और डेयरी उद्योग उत्तराखंड / Animal Husbandry and Dairy Industry in Uttarakhand
  14. उत्तराखण्ड के प्रमुख वैद्य , उत्तराखण्ड वन आंदोलन 1921 /Chief Vaidya of Uttarakhand, Uttarakhand Forest Movement 1921
  15. चंद राजवंश का प्रशासन(Administration of Chand Dynasty)
  16. पंवार या परमार वंश के शासक | Rulers of Panwar and Parmar Dynasty
  17. उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन ब्रिटिश गढ़वाल(British rule in Uttarakhand British Garhwal)
  18. उत्तराखण्ड में ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था(British Administrative System in Uttarakhand)
  19. उत्तराखण्ड में गोरखाओं का शासन | (Gorkha rule in Uttarakhand/Uttaranchal)
  20. टिहरी रियासत का इतिहास (History of Tehri State(Uttarakhand/uttaranchal)

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