उत्तराखण्ड का दूसरा सबसे ऊंचा मंदिर :-गोपीनाथ महादेव मंदिर।।

उत्तराखण्ड का दूसरा सबसे ऊंचा मंदिर :-गोपीनाथ महादेव मंदिर।। 

पहले स्थान पर 72 फीट ऊंचा केदारनाथ मंदिर हैं 
दूसरा स्थान गोपेश्वर स्थित 71 फीट ऊंचे गोपनाथ मंदिर का है।
तीसरा नवनिर्मित नृसिंह मंदिर है इसकी  ऊंचाई  68 फीट है।
यह वही स्थान है जहाँ पर 6 माह भगवान रुद्रनाथ जी की पूजा की जाती है 
Second tallest temple of Uttarakhand :- Gopinath Mahadev Temple.

गोपीनाथ महादेव मंदिर गोपेश्वर 

गोपीनाथ मंदिर एक हिन्दू मंदिर है जो भारत के उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित है। गोपीनाथ मंदिर गोपेश्वर ग्राम में है।

गोपीनाथ मंदिर एक प्राचीन मंदिर है जो भगवान #शिव को समर्पित है। यह मंदिर अपने वास्तु के कारण अलग से पहचाना जाता है इसका एक शीर्ष गुम्बद और 30 वर्ग फुट का #गर्भगृह है, जिस तक 24 द्वारों से पहुँचा जा सकता है।

मंदिर के आसपास टूटी हुई मूर्तियों के अवशेष इस बात का संकेत करते हैं कि प्राचीन समय में यहाँ अन्य भी बहुत से मंदिर थे। मंदिर के आंगन में एक 5 मीटर ऊँचा त्रिशूल है, जो 12 वीं शताब्दी का है और अष्ट धातु का बना है। इस पर नेपाल के राजा अनेकमल्ल, जो 13वीं शताब्दी में यहाँ शासन करता था, का गुणगान करते अभिलेख हैं। उत्तरकाल में देवनागरी में लिखे चार अभिलेखों में से तीन की गूढ़लिपि का पढ़ा जाना शेष है।

 दन्तकथा है कि जब भगवान शिव ने कामदेव को मारने के लिए अपना त्रिशूल फेंका तो वह यहाँ गढ़ गया। त्रिशूल की धातु अभी भी सही स्थित में है जिस पर मौसम प्रभावहीन है और यह एक आश्वर्य है। यह माना जाता है कि शारिरिक बल से इस त्रिशुल को हिलाया भी नहीं जा सकता, जबकि यदि कोई सच्चा भक्त इसे छू भी ले तो इसमें कम्पन होने लगता है।

रोचक तथ्य त्रिशूल गोपीनाथ मंदिर गोपेश्वर

 यह त्रिशूल गोपीनाथ मंदिर गोपेश्वर के प्रांगण में स्थित है 
भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार 7 वीं ई.के त्रिशूल लेख में लिखा है कि यहां नागवंश राजाओं ने इस त्रिशूल को स्थापित किया।
यह त्रिशूल फरसा युक्त है और त्रिशूल दण्ड पर संस्कृत भाषा की लिपि अंकित है,किवदन्तियों में ये भी कहा जाता है कि शिव ने इस त्रिशूल से अंधकासुर का वध करने के बाद इसे यहां गाड़ दिया था 

इसकी लंबाई 16 फुट के आस पास  है,त्रिशूल की मान्यता है कि बलपूर्वक हिलाने पर यह नहीं हिलता किंतु भक्तिपूर्वक कनिष्ठा के स्पर्श मात्र से इसमें कम्पन्न होता है

स्कन्दपुराण-केदारखंड में उल्लेखित भी है-

||त्रिशूलं मामकं तत्र चिह्नमाश्चर्यरूपकम।।
ओजसा चेच्चाल्यते तनन्हि कंपति कहिरचित। 
कनिष्ठया तु यट्सपरिष्ठं भक्त्||
Second-tallest-temple-of-Uttarakhand-Gopinath-Mahadev-Temple

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