महर्षि मार्कंडेय मंदिर, हमीरपुर जिला ( हिमाचल प्रदेश) (Maharishi Markandeya Temple, Hamirpur District (Himachal Pradesh))
महर्षि मार्कंडेय मंदिर, हमीरपुर जिला ( हिमाचल प्रदेश) (Maharishi Markandeya Temple, Hamirpur District (Himachal Pradesh))
महर्षि मार्कंडेय मंदिर, हमीरपुर जिला |
मार्कण्ड्य आश्रम, हमीरपुर
आइए शुरुआत करते हैं मारकंडा से, जो हमीरपुर जिले के डेरा परोल से 6 किमी की दूरी पर कुनाह खड्ड के तट पर स्थित है। यह स्थान महान ऋषि मार्कण्ड्य की उपस्थिति से पवित्र हुआ है।
ऋषि मार्कण्ड्य ऋषि भृगु के ही कुल के थे। वह एक महान ऋषि थे जो सभी प्रकार की हठधर्मिता से ऊपर चले गये। वह भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों के भक्त थे। वह एक महान विद्वान भी थे और विभिन्न विषयों पर उनके प्रवचनों की सभी ने सराहना की है। उनका उल्लेख विभिन्न साहित्य जैसे रामायण, महाभारत और पुराणों में किया गया था। मार्कंड्य के आश्रम देश के विभिन्न हिस्सों में थे और इसलिए हिमालय के विभिन्न हिस्सों में कई मार्कंड्य तीर्थ फैले हुए हैं।
महर्षि मार्कंडेय मंदिर, हमीरपुर जिला |
हमीरपुर जिले में स्थित मारकंडा ऐसा ही एक केंद्र है। यह बिलासपुर शहर से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर में ऋषि मार्कंड्य की मूर्ति स्थापित की गई है। ऐसा माना जाता है कि यदि निःसंतान दम्पति मार्कण्ड्य ऋषि की पूजा करते हैं तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है। वहां स्थित एक प्राकृतिक झरना कई लोगों द्वारा पवित्र माना जाता है। हर वर्ष बैशाखी के दिन मेला लगता है।
मारकंडा जाने वाले लोग उसी कुनाह खड्ड के तट पर स्थित गसियां माता के गुफा मंदिर के भी दर्शन कर सकते हैं।
महर्षि मार्कंडेय मंदिर, हमीरपुर जिलामहर्षि मार्कंडेयमार्कण्डेय भगवान शिव के परम भक्त और ऋषि थे। इनके पिता का नाम मृकंड था।[1] भगवान शिव की कृपा से ही मार्कण्डेय का जन्म हुआ था। शिव ने मार्कण्डेय को सोलह वर्ष की आयु प्रदान की थी। मार्कण्डेय बाल्यकाल से ही तीव्र बुद्धि वाले बालक थे। सोलह वर्ष की आयु पूर्ण करने पर जब यमराज ने मार्कण्डेय को यमफांश में पकड़ लिया, तब भगवान शिव ने ही मार्कण्डेय को छुड़ाया और उन्हें लम्बी आयु का वरदान दिया। महर्षि मार्कंडेय जन्मशिव को 'महामृत्युजंय' जाप द्वारा प्रसन्न करके अपनी आयु पूर्ण करने वाले बालक मार्कण्डेय शिवजी के परम भक्त थे। गढ़चिरौली, महाराष्ट्र से 20 किलोमीटर दूर चंद्रपुर मार्ग पर मार्कण्डेय नामक जगह पर आज भी हज़ारों वर्ष पुराना एक मंदिर बना हुआ है। यहाँ चारों ओर बिखरे छोटे-बड़े शिवलिंग और प्राचीन नक़्क़ाशीदार मंदिर आज भी पुराना इतिहास जीवीत रखे हुए हैं। मृकंड मुनि के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे वर माँगने को कहा था। इस पर मुनि बोले- "प्रभु! मुझे पुत्र चाहिए।" तब शिव बोले- "तुम्हें अधिक आयु वाले अनेक गुणहीन पुत्र चाहिए या फिर मात्र सोलह वर्ष की आयु वाला एक गुणवान पुत्र।" मुनि ने कहा कि- "प्रभु! मुझे गुणवान पुत्र ही चाहिए।" समय आने पर मुनि के यहाँ मार्कण्डेय नामक पुत्र का जन्म हुआ। मुनि सपत्नीक उसके लालन-पालन में लग गए और उसे किसी भी चीज की कमी नहीं होने दी। महर्षि मार्कंडेय लम्बी आयु का वरदानजब मार्कण्डेय की आयु मात्र सोलह वर्ष थी, तब आयु पूर्ण हो जाने पर यमराज ने उन्हें यमफांश में फंशा लिया। मृत्यु के देवता को सामने आया देख कर मार्कण्डेय शिवलिंग से लिपट गये। भगवान शिव ने वहाँ प्रकट होकर यमराज को ख़ाली हाथ वापस लौटने के लिए विवश कर दिया और मार्कण्डेय को लम्बी आयु का वरदान दिया। मार्कण्डेय अमर होकर तपस्या करने पहाड़ों में चले गए। महर्षि मार्कंडेय की कहानीहम में से बहुत लोगों को मार्कण्डेय ऋषि सुना होगा। हिंदू धर्म के पुराणों में मार्कण्डेय ऋषि का पुराण सबसे उत्तम और प्राचनीतम माना जाता है। इस पुराण में ऋग्वेद की भांति अग्नि, इंद्र, सूर्य आदि देवताओं पर विवेचन है और गृहस्थाश्रम, दिनचर्या, नित्यकर्म आदि की भी चर्चा है। भगवती की विस्तृत महिमा का परिचय देने वाले इस पुराण में दुर्गासप्तशती की कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्र की कथा, मदालसा-चरित्र, अत्रि-अनसूया की कथा, दत्तात्रेय-चरित्र आदि अनेक सुंदर कथाओं का विस्तृत वर्णन है। धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि अमर हैं। आठ अमर लोगों में मार्कण्डेय ऋषि का भी नाम आता है। इनके पिता मर्कण्डु ऋषि थे। जब मर्कण्डु ऋषि को कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रकट हुए भगवान शिव ने उनसे पूछा कि वे गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहते हैं या गुणवान 16 साल का अल्पायु पुत्र। तब मर्कण्डु ऋषि ने कहा कि उन्हें अल्पायु लेकिन गुणी पुत्र चाहिए। भगवान शिव ने उन्हें वरदान के रूप में मार्कण्डेय जैसा विलक्षण बालक दिया। मार्कण्डेय की नियती में 16 वर्ष की आयु में ही मृत्यु लिखी थी। जब मार्कण्डेय ऋषि 16 वर्ष के होने वाले थे, तब उन्हें ये बात अपनी माता द्वारा पता चली। अपनी मृत्यु के बारे में जानकर वे विचलित नहीं हुए और शिव भक्ति में लीन हो गए। इस दौरान सप्तऋषियों की सहायता से ब्रह्मदेव से उनको महामृत्युंजय मंत्र की दीक्षा मिली। ऋषि मार्कण्डेय पूरे समर्पण भाव के साथ शिव की पूजा में लीन थे जब यमदूत उन्हें लेने आए तो वह उनकी पूजा में विघ्न डाल पाने में सफल नहीं हुए। यमदूत को असफल होते देख स्वयं यमराज को मार्कण्डेय को लेने धरती पर आना पड़ा। यमराज ने एक फंदा मार्कण्डेय की गर्दन में डालने की कोशिश की लेकिन गलती से वह फंदा शिवलिंग पर चला गया। यमराज की इस हरकत पर शिव को क्रोध आ गया और वह अपने रौद्र रूप में यमराज के समक्ष उपस्थित हो गए। शिव और यमराज के बीच एक बड़ा युद्ध हुआ, जिसमें यमराज को हार का सामना करना पड़ा। शिव ने कहा कि मेरा भक्त मार्कंडेय सदैव अमर रहेगा और मुझसे पहले उसकी पूजा की जाएगी। तभी से उस जगह पर मार्कंडेय और महादेव की पूजा होने लगी और तभी से यह स्थान मार्कंडेय महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। लोगों का ऐसा मानना है कि महाशिवरात्रि व सावन माह में यहां राम नाम लिखा बेलपत्र व एक लोटा जल चढाने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं । सती पुराण में उल्लिखित हैं कि स्वयं पार्वती ने भी मार्कण्डेय ऋषि को यह वरदान दिया था कि केवल वही उनके वीर चरित्र को लिख पाएंगे। इस लेख को दुर्गा सप्तशती के नाम से जाना जाता है, जो कि मार्कण्डेय पुराण का एक अहम भाग है। जिला हमीरपुर मंदिर ( हिमाचल प्रदेश),District Hamirpur Temple (Himachal Pradesh),
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