मांगलिक गीत कुमाऊँ (कुमाउनी) (Auspicious Songs of Kumaon)

कुमाऊँ के मांगलिक गीत

संगीत से सम्पूर्ण विश्व का जड़ एवं चेतन पदार्थ आच्छादित है साहित्य व संगीत किसी भी देश, राज्य, अंचल के निवासियों के विचार तथा जीवन का दर्पण होता है, जिसमें वहीं के निवासियों की जीवन शैली व सांस्कृतिक परम्पराएं स्पष्ट रूप से अभिव्यक्ति को प्राप्त होती हैं। लोक का अपना संसार होता है, जो अपनी परम्पराओं और संस्कारों में विश्वास करता है। श्रुतियों द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संस्कारों की रेखाएं खिंचती चली जाती है। यदि विचार करें तो हम पाते हैं कि यही रेखाएं हमें अनुशासन में बांधती हैं और सीधा-सरल जीवन जीने की कला सिखलाती हैं। इसके पीछे गीत-संगीत का विज्ञान जुड़ा है। भारतवर्ष के लोक जीवन में गीत-संगीत की ऐसी विविध झांकियों के दर्शन होते है। लोक की इन परम्पराओं को गीत रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाना आसान है। उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मण्डल में भी गीतों की ऐसी परम्पराएं हैं जो इस समाज को हर अवसर पर जोडती हैं।

पहाड़ में गीतों की लम्बी श्रृंखला है। इन्हीं में सस्कार गीत है जो यहीं की प्रकृति और भौगोलिक स्थितियों के अनुसार गूंथे हुए हैं। वर्तमान की आपाधापी में नई पीढ़ी दूसरे ही संस्कार अपनाना चाह रही है तो स्वाभाविक है कि वह संस्कार गीतों को भी कैसे याद रख सकती है? जबकि अपने से दूर होते ही हम संसार के बीहड़ में बिलुप्त से हो जाते हैं। इसलिये जरूरी है कि गीत-संगीत के माध्यम से हमारे बुजुर्गों द्वारा जो सीख हमें दी है उसे उसी अंदाज में जीवित रखा जाए। पहाड़ के लोकव्यवहार में मैंने देखा है कि किसी कार्य के लिये जो कर्मकाण्ड होते हैं उसी से जुड़े हुए गीतों को महिलाओं द्वारा गाया जाता है। पूजा-पाठ के समानान्तर गीतों की झड़ी सी लगा देने वाली हमारी माताएं धन्य हैं। राम-सीता हमारे आदर्श हैं, इसलिये संस्कार गीतों रामीचन्द्र लछीमन सीता राणी/रानी बार-बार आते है। तमाम प्रसंगों में इन आदर्शों का नामोल्लेख करने के बाद परिजनों के नामों को लिया जाता है।

लोक जीवन की ठेठ बोली में गाये जाने वाले इन गीतों का अपना शास्त्र होता है। ऐसा नहीं है कि जो गीत इस लेख में दे दिये गये हैं उनकी पंक्तियों में लोक के गायक हेरफेर न करें, ऐसा हो सकता है क्योंकि यह इनका हाथों-हाथ गीत तैयार करने का तरीका है। फिर लोक के यह गायक आशुकवि भी हैं जो हाथों-हाथ अवसर के गीतों को तैयार करने में माहिर होते हैं। गिदार/गितार/गायक महिलाएं जानती है कि किस क्रम में कौन सा गीत होगा। साथ ही जिस परिवार में ऐसा अवसर आया है. उस परिवार के अनुसार नामोल्लेख भी होना है। इस लोक से उस लोक तक पीढ़ियों का स्मरण करने वाली यह परम्परा अ‌द्भुत है। यदि इसकी गहराई में चले जाओ तो आँखें नम हो जाती है। शायद यही लोक का व्यवहार भी है जो हमें सदभावना सदाचार सिखाता है।

कुमाऊँ का लोक लोक संगीत, यहाँ के लोक गीत, लोक गाथाओं आदि में निहित है। यहाँ का संगीत जिस मधुरता के साथ व्यक्त होता है, यह यहाँ के तीज त्यौहारों, उत्सवों, विवाह आदि संस्कारों में दिखाई देता है। यहाँ के पर्व उत्सव तथा त्यौहार एक-दूसरे के साथ इस प्रकार घुले मिले हैं कि  इससे सारा लोक जीवन अपनी लोक संस्कृति की एक विशिष्टता धारण किये हुए है।

बदलते समय के साथ हमारी इस परम्परा में भी बदलाव आया है और ठैठ कुमाउनी बोली के साथ-साथ खड़ी बोली में भी संस्कार गीत होने लगे हैं। जमाने की चकाचौंध में झूम रही नई पीढी तो लोक की इन विधाओं से दूर अपने मन मुताबिक थिरकने में विश्वास कर रही है। इतना सब होने के बावजूद लोक का यह शास्त्र, लोक का यह विज्ञान, लोक का यह तर्क अपनी जगह है। प्रस्तुत हैं कतिपय गीत जो कर्मकाण्ड के साथ-साथ यहाँ के लोक में सुनाई देते हैं-

शकुनाखर (मंगलाचरण)

शुभकार्य आरम्भ होने पर गणेश भगवान का स्मरण करने साथ ही शकुन गीत गाये जाते हैं। इस गीत में महिलाओं के नाम में पहली पत्नी को 'सुन्दरी' और दूसरी पत्नी होने पर उसे मंजरी कहा जाता है। बेटियों के नाम के आगे देही कहा जाता है।

शकुना दे शकुना दे सव सिद्ध, काज ये अति नीको शुकना बोल्या। 
दाईना बजन छन, शैख शब्द देणी तीर भरियो कलेश।
अति नीको सो रंगोलो, पटलोऑचली कमलै को फूल।
सोही फूलू मौलावन्त, गणेश रामीचन्द्र लछीमन लवकुश
जीया जनम आध्या अम्बरू होय ।
सोही पाट पैरी रहना, सिद्धि बुद्धि सीतादेही बहुराणी। 
आयुवन्ती पुत्रवन्ती होय सोही फूलू मोलावन्त
(परिवार को पुरुषों के नाम)
जीवा जनम आध्या अम्बरू होय।
 सोही पाट पैरी रहा, सिद्धि बुद्धि
(परिवार की महिलाओं के नाम सुन्दरी, मंजरी आदि)
 आयुवन्ती पुत्रवन्ती होय ।।

भावार्थ- शकुनांखर गाओ, अत्ति सुन्दर शुभ कार्य हो रहा है। दाहिनी ओर मधुर शंख घण्ट बज रहे हैं और कलश भरा हुआ रखा है। रंगीन पाट के आंचल में कमल का फूल रखा है, जिसे गणेश जी, रामचन्द्र जी, लक्ष्मण जी, लवकुश जील लाए वे युग-युग जिये अमर रहें। वही पाट पहनने वाली सिद्धि बुद्धि सीतादेही सदा सौभाग्यवती पुत्रवती हो। वही फूल लाए पुरुषों बालककों के नाम वे युग-युग जीते रहे. अमर रहें। उनकी सुहागिनें सुन्दरी/मंजरी सदा सौभाग्यवती पुत्रवती हों।

न्यूतणौ (निमन्त्रण देना)

शुभकार्य के लिये सूर्य, चन्द्रमा, देवताओं सहित सभी ईष्ट मित्रों को निमंत्रण देने का रिवाज मांगलिक गीतों में है-

प्रातहि न्यूत में सूरज किरन को अधिकार,
सन्ध्या न्यूत में चन्द्रमा तारन को अधिकार।
ब्रह्मा विष्णु, न्यूत में काज सो ब्रह्मा, विष्णु सृष्टि रचाय 
गणपति न्यूत में काज सौ. गणपति सिद्धि ले आय। 
ब्राह्मण न्यूत में काज सौ. सुहागिनी, न्यूत में काज सौ। 
कामिनी न्यूत में काज सौ ब्राह्मण वेद पढ़ाय। 
सुहागिनी मंगल गाय, कामिनी दियो जगाय । 
शंख-घंट न्यूत में काज सी मालिनी न्यूत में काज सौ। 
भ्युरिय न्यूत में काज सौ शंख घंट शब्द सुनाय। 
मालिनी फूल ले आय, भ्यूरिया दूबो ले आय।
कुम्हारिनि न्यूत में काज सी विवरिनी न्यूत में काज सौं। 
अहोरिनी न्यूत में काज सौ कुम्हारिनी कलश ले आय। 
धिवरिनि शकुन ले आय, अहीरिनि दूध ले आय 
गूजरिनि दझ्या ले आये।
बहिनियों न्यूत में काज सौ बान्धव न्यूत में काज सौ
बहिनियां रोचन ले आय, बान्धव शोभा ले आय।
 बढ़ड्या न्यूत में काज सौ बढड्या चौको ले आय।
 वाजिन्न बाजो ले आय समाए बधायो न्यूतिये।

भावार्थ प्रातःकाल में सूर्य और सायंकाल को चन्द्रमा को निमंत्रण देती हूं। क्योंकि उनका अधिकार है, सूर्य की किरणें व चन्द्रमा की ज्योति फैलेगी, तारे जगमगाएंगे। श्रृष्टि रचाने वाले ब्रह्मा-विष्णु को निमंत्रण देती हूँ, हर कार्य सिद्ध करने वाले गणेश जी को भी निमंत्रण। ब्राह्मणों, सुहागिनों, कामिनी को निमंत्रण क्योंकि वह वेद पढ़ना मंगलगान और दीप जलायेंगी। इसी प्रकार शंख-घंट अपने शब्द सुनायेंगे, मालिन फूल लायेगा, कुम्हार कलश, अहीरिन दूध, गुजरिया दही, बहिन रोली अक्षत, बढ़ईया चौका बनाकर लायेगा, बाजेवाले बधाई के गीत बजायेंगे। इन सभी को निमंत्रण।

गणेश पूजा

शुभ कार्य के आरम्भ में गणेश जी की पूजा की जाती है। वह निर्विघ्न कार्य सम्पन्न करने वाले देवता है

जय जय गणपति जय जय हेरम्भ, सिद्धि विनायक एक दन्त 
एक दन्त शुभ्र कर्ण गॅवरि के नन्दन, मुष को वाहन सिन्दुरि सो है।।
गावत सुर नर बोलन्त कुलयधु अग्नि बिना हो नहीं 
बह्या बिना वेद नहीं।
पुत्र धन वायक यशन रच शुभ जय गणपति लगन की वेर ए
आरम्भ रचिये ले शंकर, देव, मोती माणिक होरा चौक पुरीय ले। 
सुवरण भरिये कलेशन ए. तसु बौका बैठला रामीचन्द्र
लछीमन विप्र ए।
 ज्यों लाई सीता देवी, बहुराणी काज करें राज रचे।
फूलन छी फलन छी जाइ की वान्ती ले 
फूल ब्यौणी त्यालो वालो, आपूं रूपीं माणि ए.
मोती माणिक हीरा, चौक पुरोय ते।।

मातृ पूजा

इस गीत के समय लकड़ी के पीले रंग के चौक में रोली अथवा रंग से गणेश-गौरी सहित सोलह मात्राएं बनाई जाती हैं, ये देवताओं की पत्नियों होती है। जो क्रमशः गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मात्रा, लोमात्रा, घृता, पुष्टि, तुष्टि, आत्मना है। जब नववधू के आगमन पर द्वारमात्रा बनाई जाती है. वहाँ पर सात देवियों की पूजा होती है। नववधू उनकी पूजा कर देवी के रूप में गृह प्रवेश करती है-

के रे लोक उपजनी माई मात्रा देव ए।
कै रे कोखी उपजनी रामचन्द्र पूत ए
 लछीमन पूत ए चल तुमी भाई मात्र इनू घरी आज ए 
इनू घरो बोला हरा काज सोह ए। 
कौशल्या राणी कोखी उपजनी राभीचन्द्र पूत ए। 
सुमित्रा राणी कोखी उपजनी लक्षमन पूल ए। 
माथ लोक उपजनी माई मात्रा देव ए। 
चल तुमो माई मात्रा इनू घरी आज ए। 
इनूं घरी घौली हरा काज सोई ए। 
(महिलाओं सहित कुटुम्ब का पुरुषों का नाम) 
(अमुम कोखी उपजनी अमुक पुत ए) 
माथ लाक उपजनि माई मात्रा इनू घरी आज ए। 
ईनू घरो धौली हरा काज सोह ए।

बसोद्धारा

किसी शुभ कार्य में मातृ पूजन में घृत से सप्तधार दी जाती है जिसे बसोद्धारा कहते हैं। गिदार/गायिका कहती गाती है उसी पवित्र धी को रामचन्द्र लक्ष्मण माथे पर लगाते हैं और सीता जी अपना श्रृंगार करती है-

वसोद्धारा बसोद्वारा धार उधारा
तसू घृत ले रामीचन्द्र लछीमन माथ भराए 
यसोद्धारा बसोद्धारा धार उघारा 
तसू घृत ले सीता देही बहुराणी श्रृंगार करए 
तसु घृत ले (कुटुम्ब के पुरुषों का नाम) माथ भराए
तसु घृत ले (कुटुम्ब की महिलाओं का नाम) श्रृंगार कराए।

आवदेव (पितृपूजन गीत)

शुभ कार्यों में पितृपूजन होता है। श्रद्धावश वस्त्र, धन, द्रव्य, अनाज, फल, मेवा इत्यादि रखा जाता है और तीन कुल के पितरों के नाम इस पूजा में लिये जाते हैं। अपने पुरखों को याद करते हुए गिदारिने/गायिकायें गाती है- हे भंवर। तुम स्वर्ग जाकर हमारे पितरों को निमंत्रण दे आओ.....

जाना जाना भैवरिया माथ लोक
माथ लाक पितरन न्यूत दे आए।
नौ नी जाणन्यू गौ नी पछाड़न्यू
कॉ रे होलो पितरन को द्वार ए 
आधा सरग बादल रेखा आधा सरग चन्द्र सूरज ए 
आध सरग पितरन का द्वार चौरे लोली पितरन को द्वार ए 
आओ पितरी मध्य लोक, तुमन करणी न्यूत छ आंज 
स्वर्ग हैं पूछना छन दशरथ ज्यू यो कसू घरी न्यूतो छ आज
जो रे तुम ले नाना छन दूद दोया नेछ पोछा घृत मला 
अमृत सींचा रामीचन्द्र लछीमन उर्दू घरी न्यूतो छ आज ए 
स्वर्ग हैं पूछनी छन कौशल्या राणी ज्यू यी सुमित्रा राणी ज्यू
यो कसो बहुअन ले गोत्र बढ़ायो ए। 
जो तुमन लै बड़ा कुल की बड़ा बंश की बहुआ आणी 
उसू बहुअन ले गोत्र उज्यारो ए जो रे तुमन लै 
नाना छन उर ही में बोका, भीमें छोड़ा उसू धरी
न्यूतो छ आज ए कसिकै ऊँलो पूल नातियो 
(कुटुम्ब का पुरुषों नाम) लंका छोड़ी पों न पहुंचे. 
नजर न सूझे सुनियो ललो पितरो खुटकूणों
रूपती लैलो किवाड ऐ छी रया तुम पुत नातियो 
लाख बरीस बहुआ तुमरी जनम आयुवन्ती 
बहुआ तुमरी जनम पुत्रवन्ती ए जो रे काज पूत नातियो 
हमन बलूंछा सोरे काज अति नीका ए 
सो रे काज सर्व सिद्ध ए

पुण्याहवाचन

पुण्याहवाचन में यजमान अपने पुरोहित/ब्राह्मण से कार्य सिद्धि, पुण्य व शान्ति का आशीर्वाद मांगते हैं कि उनके कार्य निर्विघ्न पूर्ण हों-

रामीचन्द्र लछीमन धरणी धराय हो धरणी धराय 
सीता देही बहू राणी दियो बड़ो दानत बड़ी रे 
अविय ले सम्पत्ति पुरिलये दियो बडी दान त 
ऐवान्ति मंगल देली त ब्राह्मण वेद पड़े। 
दुहागिनी मंगला देली त ब्राह्मण वेद पढ़े।

कलश स्थापन

शुभ कार्य में पंचांग कर्म पूजा की जाती है जिसमें कलश स्थापना का महत्व है। इसमें गाये जाने वाले गीत के तीन भाग हैं। पहले भाग में कलश स्थापना जिन वस्तुओं से की जाती है. दूसरे में इस शुभ अवसर पर कौन-कौन भागीदारी करने आते हैं और तीसरे भाग में पूजा करने वालों का परिचय नाम लेकर दिया जाता है-

धरती धरम ले कलश थापि ले
आजू भरियो कलश आज बधावन नगरी सुहावन 
सप्त धान्य ले कलश थापि ले 
तामा का कुम्भ ले कलेश थापि ले 
आज भरियो कलेश आज बधावन नगरो सुहावन 
गंग जमुन का नीर ले कलेश थापि ले 
आजु भरियो कलश आज बधावन नगरी सुहावन 
दधि-दूध घृत ले कलेश थापि ले 
हल्दी की गोंठि ले कलश चापि ले 
साई का अक्षतन ले रेशमी वस्त्र ले 
तेसूत्रा धागा ले कलश थापि ले 
फूल. दूध ले कलश थापि ले 
गाई का गोबर ले कलेश थापि ले 
खेत का जौने ले कलश थापि ले 
आजु भरियो कलश आज बधावन नगरी सुहावन, 
लाड़ सुवालन ले कलश थापि ले 
फोणी बातसन ले थापि ले सर्व धान्य सर्व औषधिन ले
कलश थापि ले. धन द्रव्य लै कलेश थापि ले 
आज भरियो कलश, आजु बधावन नगरी सुहावन
जहाँ धरियो है भरियो कलश, जहाँ वैचला इनि मंगल गाइए 
जहाँ ताइनि मंगल गाये, तहाँ ब्रह्मा विष्णु सृष्टि रचाइये 
जहाँ गणपति सिद्धि ले आइए
तहाँ शख. घंट शब्द सुनाइये, जहाँ शंख घंट शब्द सुनाये
तहाँ ब्राह्मण वेद पढ़ाइये, जहाँ ब्राह्वाण वेद पढ़ाये, तहीं सुहागिनि मंगल गाइये सुहागनि मंगल गायें 
तहाँ मालिनी फूल ले आईए जहाँ भ्यूरिया दूबों से आयो,
तहाँ कुम्हारिनि कलश ले आइए जहाँ कुम्हारिनि कलश ले आई
तहाँ अहीरिनि दूध से आइए जहाँ अहीरिनि दूध ले आई
तहाँ गुजरिनि दइयो ले आइए धिबरिनि शकुनो ले आइये
हलनाई चीनी ले आइए बड़ड्‌या चौकी ले आइये
वाजित्र बाजो बजाइए, बहिनियां रोचन ल्याइए
देरानी जेठानी मिलि आइए
तुम रामीचन्द्र लछीमन कवन के पूल तुम कथन मय्या लै 
उरधरे तुम कवन उर्दू के बालम तुम कवन बहिनियां के वीरन
हम रामीचन्द्र लछीमन दशरथ के पूल मैया कौशल्या राणी
लै उर धरो मेरी मय्या सुमित्रा राणी लै उरधरो
उरधरो है लला दश मास।
हम बहुआ सीता देहि के बालम हम बहुआ
उर्मिला देहि के बालम हम बहिनी सुभद्रा देहि के बरीन 
(इस प्रकार कुटुम्बी जनों के नाम को उच्चारण करना है)

नव ग्रह पूजा

नवग्रह पूजा गीत में मंगल करने वाले देवों का स्मरण करते हुए घर विशेष में मंगल ही मंगल दिखाई दे रहा है। क्योंकि सभी देवी-देवता वहाँ पधार रहे है-

जै मंगल शुभ मंगल ऊन शुभ मंगल इनू घरि आये आज ए।
गावन्त मंगल, बोलन्त शुभ मंगल ऊन शुभ मंगल इनूं घरि आज ए
हंस बाहन चढ़ि ब्रह्मा ज्यू चलि आया ऊन शुभ मंगल घरि आज ए
गरुड़ वाहन चढ़ि विष्णु ज्यू चलि आया ऊन शुभ मंगल धरि आज ए
वृषभ वाहन चढ़ि शम्भू ज्यू चलि आया ऊन शुभ मंगल धरि आज ए
सिंह वाहन चढ़ि दुर्गा देवी चलि आया,
मुष वाहन चढ़ि गणेश ज्यू चलि आया, 
हस्ति वाहन चदि इन्द्र ज्यू चलि आया ऊन शुभ मंगल धरि आज ए 
स्थ वाहन चढि सूर्य ज्यू चलि आया ऊन शुभ मंगल धरि आज ए 
मृग वाहन चढ़ि चन्द्र ज्यू चलि आया 
भेष वाहन चडि भौम ज्यू चलि आया 
सिंह वाहन चढ़ि बुध ज्यू चलि आया 
हस्ति वाहन बढ़ि गुरु ज्यू आया ऊन शुभ मंगल धरि आज ए 
अश्व वाहन चढि शनि ज्यू आया 
सिंह वाहन चढ़ि राहु ज्यू चलि आया 
गृध वाहन चढि केतु ज्यू चलि आया ऊन शुभ मंगल धरि आज ए 
अधिदेवता प्रत्याधि देवता चलि आया, ऊन शुभ मंगल धरि आज ए 
औरे देवा होला मण्डप बाहर ए 
योरे देवा पूजियन लै सर्वसिद्धि होली, 
ऊन शोभा मंगल ईनू घरी आज ए।

अग्नि स्थापना

होम के लिये अग्नि प्रज्वलित करते समय गिदार / गायक गाते हुए अग्निदेव का आ‌ह्वान करती है कि चारों दिशाओं में हेरा फेरा/घूम आया अग्निदेव नहीं मिले। अन्त में पीपल के पेड़ के नीचे वैश्वानर मिले, हाथ में धोती बगल में पोथी थी। तुम्हारे बिना कोई काज सिद्ध नहीं हो रहा है।... कैसे आऊँ वहाँ तो सबकुछ उल्टा ही हो रहा है. सबकुछ ठीक होता है और वैश्वानर देव आते हैं-

पूर्व को देश मैल हेरो फेरो नहिं पाया वैश्वानार देव ए नहिं
पाया पश्चिम को देश मैले हेरो फेरो नहिं पाया वैश्वानर देव ए नहिं पाया। 
उत्तर को देश मैले हेरो फेरो नहि पाया वैश्वानर देव ए नहिं पाया दक्षिण को देश मैले हेरो फेरो, नहीं पाया 
वैश्वानर देव ए नहिं पाया, पीपल की डाली मुणीं पाया छन वैश्वानर देव ए पाया छन हात 
धोती कोख पोथी पाया छन वैशयानर देव ए पाया छन 
चल तुमी वैश्वानर मध्य लोक तुम बिना होम नहीं यज्ञ 
ए तुम बिना कसि करी ऊँलो तुमरा देश विपरीत चलिए
तुमरा देश, सासु वां तो लिपो चैस ब्यारी वां त चौका 
बैठ विपरीत चला ए तुमरा देश।
जेठो भाई पाया चली कॉसो भाई घोड़ी चढ़ी विपरीत चाल ए तुमरा देश। 
तुमन बिना गाई रैया बॉध्या, बालो रैगी बटु कन्या रैगे 
क्वारी तुमन बिना अब लेली सूची रीत चाल ए अब 
लेली ब्वारी वां तो लिपो घैस सासु वाँ त चौका बैटि 
अब होली। अब होलो जेठो भाई गोड़ी चढ़ी कॉसो भाई पाया चलो सुधीरीत चाम ए व होली। 
हाथ धोती कॉख पोथी आया छन वैश्वानर देव ए आया छन।

 होम

यज्ञ करते समय इस प्रकार के गीत समानान्तर बलते रहते हैं-
धिय की गगरी बढाऔ रे बटुवा पाननले मंडया छ्थाओ रे बटुव
श्रीखंड दार लगाओ रे बटुवा लौंगन की बाड बंधाओ रे बटुवा 
तब तेरी आहुति देत श्याम, वेद पढ़ि झम्टि रहें नारायण बटुवा 
किसके कुल तुम उपजरो बटुवा कवन के तुम नाती पूत श्याम 
वेद पढि झम्टि रहे नारायण बटुवा।
दशरथ के कुल उपजो रे बटुवा दशरथ के हम नांती.
रामीचन्द्र के हम पूत श्याम वेद पढ़ि झम्टि रहे नारायण बटुवा 
को तेरी आहुति देत श्याम वेद पढ़ि झम्टि रहे नारायण बटुवा 
अर्जुन वेदी बाँधो दे बटुवा रामीचन्द्र आहुति देत 
श्याम वेद पढि झम्टि रहे नारायण बटुवा 
(इसी प्रकार कुटुम्बिजनों के नाम को उच्चारण करते हैं।)
बालो ए वैश्वानर मानूर।
लियौ येदी वैश्वानार समिध वैसेटी को होम। 
लीयो वैदी वैश्वानर समिध को होम 
तील को होम जौं को होम, घृत को होम ए। 
बालो ए वैश्वानर मानूर लीयौ बेदी वैश्वानर लाडू को होम 
सुवालो को होम, रोहिणी को होम फूल दुबो को होम ए। 
बाला ए वैश्वानर मानूर लीयौ बेदी वैश्वानर, 
अणत को होम रामीचन्द्र ठोया ठोया होम करला,
लछीमन बेदान्त का अगला होला ए 
लछीमन ठोया ठोया होम करला। 
लव कुश वेदान्त का अगला होला ए।

इस प्रकार सभी अवसरों के अनगिनत गीत लोक की वाणी में हैं। समय के साथ गीतों के प्रकार बदले हैं, यहाँ तक कि कई पुराने गीत लुप्त हो चुके हैं। सारे संस्कारों के अलावा पूजा-आरती में कई प्रकार के गीत व त्यौहारों में गाये जाने वाले गीतों का प्रचलन अभी तक जिस भी रूप में है, उसे संरक्षित तभी किया जा सकता है जब कि उसे व्यवहार में उतारा जाए।

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